Ticker

6/recent/ticker-posts

ग्रेट निकोबार परियोजना


 

मुख्य बिंदु 

ग्रेट निकोबार परियोजना का उद्देश्य इस द्वीप को एक रणनीतिक समुद्री और आर्थिक केंद्र के रूप में परिवर्तित करना है। पूर्व-पश्चिम शिपिंग मार्ग से इसकी निकटता (लगभग 40 नॉटिकल मील) का लाभ उठाते हुए, यह परियोजना विदेशी ट्रांसशिपमेंट बंदरगाहों पर निर्भरता को कम करेगी। साथ ही, रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के उद्देश्यों को सर्वोपरि रखते हुए यह भारत की समुद्री सीमाओं को नई मजबूती प्रदान करेगी।

  • इस परियोजना में प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर कंपोनेंट्स शामिल हैं: 14.2 मिलियन ट्वेंटी फुट इक्विवेलेंट यूनिट (एमटीईयू) क्षमता वाला एक इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, एक ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट (4000 पीक आवर पैसेंजर्स क्षमता), 450 एमवीए गैस-सोलर पावर प्लांट और एक प्लान्ड टाउनशिप।
  • यह विकास एक रेगुलेटेड एनवायरमेंटल फ्रेमवर्क के अंतर्गत किया जा रहा है, जिसमें ईआईए नोटिफिकेशन 2006 और आईसीआरजेड नोटिफिकेशन 2019 के तहत मंज़ूरी प्राप्त की गई है। इस परियोजना में 42 कम्प्लायंस कंडीशंस का पालन अनिवार्य है। इसके तहत द्वीप के केवल 1.82 प्रतिशत फॉरेस्ट कवर का डायवर्जन किया जाएगा, जिसके बदले में 97.30 वर्ग किमी क्षेत्र में क्षतिपूर्ति वनीकरण की योजना बनाई गई है।
  • जनजातीय कल्याण इस परियोजना के केंद्र में है, जिसके अंतर्गत शोंपेन और निकोबारी समुदायों के लिए किसी भी प्रकार का विस्थापन प्रस्तावित नहीं है। इसके अतिरिक्त, पुनः अधिसूचना उपायों के माध्यम से अधिसूचित जनजातीय आरक्षित क्षेत्र के कुल दायरे में शुद्ध वृद्धि सुनिश्चित की जा रही है।

 

परिचय

ग्रेट निकोबार परियोजना एक सामरिक पहल है, जिसका उद्देश्य अंडमान सागर और दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत की उपस्थिति को सशक्त बनाना है। यह परियोजना बंदरगाह-आधारित विकास और सटीक पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों  के साथ-साथ स्थानीय मूल समुदायों के संरक्षण के बीच एक आदर्श संतुलन स्थापित करने का प्रयास करती है। सामरिक, आर्थिक और पर्यावरणीय प्राथमिकताओं के अनूठे संगम के माध्यम से, यह परियोजना सुनिश्चित करती है कि ग्रेट निकोबार का विकास न केवल समावेशी और सतत हो, बल्कि राष्ट्रहित के भी पूर्णतः अनुरूप हो।

इस परियोजना में शामिल हैं:

  1. इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (आईसीटीटी), जिसकी क्षमता 14.2 मिलियन टीईयू (ट्वेंटी-फुट इक्विवैलेंट यूनिट) है।
  2. ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट, जिसकी क्षमता व्यस्त समय में 4000 पैसेंजर्स प्रति घंटा होगी। ऊर्जा की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए 450 एमवीए (मेगावोल्ट एम्पीयर) क्षमता का एक हाइब्रिड बिजली संयंत्र, जो प्राकृतिक गैस और सौर ऊर्जा के स्वच्छ स्रोतों पर आधारित होगा।
  3. लगभग 16,610 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला एक नया टाउनशिप।

 

यह विकास कार्य एक संवेदनशील और समग्र दृष्टिकोण पर आधारित है, जिसमें स्थानीय मूल समुदायों की आवश्यकताओं और द्वीप के पर्यावरणीय संसाधनों के संरक्षण को सर्वोपरि रखा गया है। यह योजना सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय प्रभावों का सूक्ष्मता से मूल्यांकन करती है तथा ऐसे विकल्पों को प्राथमिकता देती है जो पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक लक्ष्यों के मध्य एक आदर्श संतुलन स्थापित करते हों।

 

ग्रेट निकोबार परियोजना के प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर कंपोनेंट्स

 

1. इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल

 

भारतीय बंदरगाहों में विशालकाय पोतों के लिए आवश्यक गहराई वाले बर्थ की कमी है। इसी कारण, भारतीय कार्गो को कोलंबो और सिंगापुर के माध्यम से भेजा जाता है, जिसके परिणामस्वरूप भारत को भारी राजस्व की हानि होती है। म्यांमार, चीन और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देश इस समुद्री व्यापार पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए तीव्रता से गहरे पानी की बुनियादी सुविधाओं का विस्तार कर रहे हैं।

 

इस संदर्भ में, आईलैंड डेवलपमेंट प्रोग्राम के अंतर्गत ग्रेट निकोबार द्वीप के समग्र विकास के हिस्से के रूप में गैलाथिया बे में इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट (आईसीटीपी) विकसित किया जा रहा है। प्रस्तावित हवाई अड्डे, टाउनशिप और पावर प्लांट के साथ मिलकर, गैलाथिया बे ट्रांसशिपमेंट पोर्ट पूरे ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट के एक प्रमुख बुनियादी ढांचागत घटक के रूप में स्थापित है।  यह बंदरगाह सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ईस्ट-वेस्ट इंटरनेशनल शिपिंग रूट के अत्यंत निकट (लगभग 40 नॉटिकल मील की दूरी पर) स्थित है और यहाँ 20 मीटर से अधिक की प्राकृतिक गहराई है। अपनी इसी रणनीतिक स्थिति के कारण यह 'गेटवे' और 'ट्रांसशिपमेंट' दोनों प्रकार के कार्गो को आकर्षित करने में सक्षम है, जिससे कोलंबो, सिंगापुर और क्लांग जैसे विदेशी बंदरगाहों पर भारत की निर्भरता कम होगी। इस परियोजना को भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा उपस्थिति को सुदृढ़ करने, द्वीपों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने और इस क्षेत्र के समग्र विकास को गति देने के लिए तैयार किया गया है।

 

2. ग्रीनफील्ड अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा

इस द्वीप पर विश्व स्तरीय पर्यावरणीय संसाधन उपलब्ध हैं, जो भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों को आकर्षित करने की अपार क्षमता रखते हैं। कनेक्टिविटी में सुधार और द्वीप को पर्यटन के लिए खोलने हेतु एक अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा अनिवार्य है। भौगोलिक दृष्टि से यह द्वीप सेनैंग सिटी, फुकेत द्वीप और लंगकावी द्वीप जैसे प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन स्थलों के अत्यंत निकट है। वर्तमान में पोर्ट ब्लेयर हवाई अड्डा सालाना लगभग 1.8 मिलियन यात्रियों का आवागमन संभालता है। ऐसी संभावना है कि नया हवाई अड्डा अपने उद्घाटन के समय कम से कम 1 मिलियन यात्रियों को सेवा प्रदान करेगा, जिसकी संख्या भविष्य में बढ़कर 10 मिलियन यात्री प्रति वर्ष तक पहुँचने का अनुमान है।

 

3. टाउनशिप और सुनियोजित नगरीय विकास

इस प्रस्तावित टाउनशिप का उद्देश्य द्वीप के बंदरगाह-आधारित विकास से उत्पन्न होने वाली आवासीय, वाणिज्यिक और संस्थागत आवश्यकताओं को पूरा करना है। यह समग्र एकीकृत विकास ढांचे के अनुरूप, कार्यरत कर्मियों, सेवा प्रदाताओं और संबंधित आर्थिक गतिविधियों के लिए आवश्यक शहरी बुनियादी ढांचा प्रदान करेगी।

 

4. पावर प्लांट

ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, हवाई अड्डे और संबंधित शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर के सुचारू संचालन के लिए विश्वसनीय विद्युत इंफ्रास्ट्रक्चर अपरिहार्य है। वर्तमान में, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में ऊर्जा का मुख्य स्रोत डीजल जेनरेटिंग सेट हैं। इस विद्युत संयंत्र का प्राथमिक उद्देश्य बिना किसी व्यवधान के उच्च गुणवत्ता वाली और विश्वसनीय विद्युत ऊर्जा प्रदान करना है। इस प्रणाली को इस प्रकार डिजाइन किया गया है कि किसी एक मुख्य पुर्जे के खराब होने पर भी बिजली की आपूर्ति निरंतर बनी रहे। इसके अतिरिक्त, ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने के लिए अक्षय ऊर्जा स्रोतों की भी योजना बनाई जाएगी। निर्बाध ऊर्जा आपूर्ति द्वीप की जीडीपी में वृद्धि सुनिश्चित करने वाला एक प्रमुख कारक है।

 

परियोजना का सामरिक और आर्थिक महत्व

ग्रेट निकोबार परियोजना को तीन अलग-अलग चरणों में कार्यान्वित किया जा रहा है -

  • चरण I (2025–35, 72.12 वर्ग किमी),
  • चरण II (2036–41, 45.27 वर्ग किमी),
  • चरण III (2042–47, 48.71 वर्ग किमी)

यह परियोजना कुल 166.10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत है, जिसमें 35.35 वर्ग किलोमीटर राजस्व भूमि और 130.75 वर्ग किलोमीटर वन भूमि सम्मिलित है। यह चरणबद्ध दृष्टिकोण न केवल व्यवस्थित बुनियादी ढांचे के विकास को संभव बनाता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक चरण में पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों और जनजातीय कल्याण संबंधी उपायों को प्रभावी ढंग से एकीकृत किया जाए।

इस परियोजना के सामरिक और आर्थिक महत्व को हिंद महासागर क्षेत्र (आईओआर) में ग्रेट निकोबार को एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में स्थापित करने की आवश्यकता से बल मिलता है। इस परियोजना में जमीन का सही इस्तेमाल करने और पर्यावरण का पूरा ख्याल रखने पर जोर दिया गया है, ताकि आने वाले समय में इस पूरे इलाके को बड़ा फायदा मिल सके। साथ ही, इस काम में पर्यावरण से जुड़े सभी नियमों (ईआईए) और कानूनी स्वीकृतियों का पूरी तरह पालन किया जा रहा है।

सतत विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों का सही ढंग से उपयोग सुनिश्चित करने हेतु पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) एक प्रमुख साधन है। ईआईए अधिसूचना, 2006 के नियमों के अनुसार, विशेष श्रेणियों की परियोजनाओं के लिए यह प्रक्रिया अनिवार्य है। अलग-अलग क्षेत्रों की विशेषज्ञ समितियाँ परियोजना के प्रस्तावों की गहराई से जाँच करती हैं, पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन करती हैं और उसी आधार पर परियोजना को मंजूरी देने या न देने की अनुशंसा करती हैं।

ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना का पर्यावरण प्रभाव आकलन

  • परियोजना ने स्क्रीनिंग (छंटनी), स्कोपिंग (कार्य-क्षेत्र निर्धारण), जन-परामर्श और मूल्यांकन की एक विस्तृत प्रक्रिया के बाद, 'ईआईए अधिसूचना, 2006' के तहत पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृति प्राप्त कर ली है।
  • पर्यावरणीय स्वीकृति में वायु, जल, ध्वनि, अपशिष्ट प्रबंधन, समुद्री पारिस्थितिकी, मानव स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन से संबंधित 42 विशिष्ट शर्तें सम्मिलित हैं, जिन्हें एक सशक्त पर्यावरण प्रबंधन योजना (ईएमपी) के माध्यम से क्रियान्वित किया जाएगा।
  • भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (जेडएसआई), सलीम अली पक्षी विज्ञान और प्राकृतिक इतिहास केंद्र (सैकॉन), भारतीय वन्यजीव संस्थान  (डब्ल्यूआईआई) और भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) जैसे विशेषज्ञ संस्थानों ने इस संबंध में विस्तृत अध्ययन किए हैं। भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (जेडएसआई) ने स्पष्ट किया है कि उचित सुरक्षा उपायों के साथ इस परियोजना को आगे बढ़ाया जा सकता है।
  • प्रदूषण नियंत्रण, जैव विविधता संरक्षण, और शोंपेन एवं निकोबारी समुदायों के कल्याण की निगरानी हेतु तीन स्वतंत्र निगरानी समितियों का गठन किया गया है।  समितियाँ इस प्रकार हैं:
    1. प्रदूषण संबंधी मामलों की निगरानी हेतु समिति
    2. जैव विविधता संबंधी मामलों की निगरानी हेतु समिति
    3. शोंपेन और निकोबारी समुदायों के कल्याण एवं उनसे जुड़े मुद्दों की निगरानी हेतु समिति
  • अंडमान एवं निकोबार प्रशासन के मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक सर्वोच्च समिति का गठन किया गया है, ताकि सभी हितधारकों के बीच ईसी और सीआरजेड की शर्तों का समन्वित कार्यान्वयन सुनिश्चित किया जा सके। यह समिति निरीक्षण, निगरानी और अंतर-संस्थागत समन्वय के लिए एक केंद्रीय तंत्र के रूप में कार्य करती है।

पर्यावरणीय सुरक्षा उपाय और वन क्षेत्र को होने वाली क्षति की भरपाई

परियोजना को अंतिम मंजूरी मिलने से पहले, इसे कई स्तरों पर कड़ी वैधानिक जांच से गुजरना पड़ा है। इसी प्रक्रिया के तहत एक विस्तृत पर्यावरण प्रबंधन योजना (ईएमपी) तैयार की गई है, जो निर्माण से लेकर परियोजना के संचालन तक—हर चरण में पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों को कम करने के ठोस उपायों की रूपरेखा प्रस्तुत करती है।

पर्यावरण प्रबंधन योजना (ईएमपी) एक ऐसा व्यापक खाका है जो प्रस्तावित परियोजना के साथ सतत विकास सुनिश्चित करता है। इसमें उद्योग, सरकार, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और स्थानीय नागरिकों की सक्रिय भागीदारी निहित है, ताकि विकास और प्रकृति के बीच एक आदर्श सामंजस्य बना रहे।

इसमें पर्यावरणीय प्रभावों को न्यूनतम करने के उपाय किए गए हैं। नुकसान को कम करने की प्रक्रिया सीधे इसके स्रोत और परियोजना स्थल, दोनों स्तरों पर की जा रही है। परियोजना के संचालन के दौरान, ईएमपी का मुख्य फोकस आर्थिक विकास की गति को तेज करने के साथ-साथ पर्यावरण पर पड़ने वाले निरंतर प्रभावों को न्यूनतम करने पर केंद्रित रहता है।

ग्रेट निकोबार परियोजना के अंतर्गत पर्यावरणीय संतुलन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए अंडमान और निकोबार द्वीपों के कुल वन क्षेत्र का मात्र 1.82 प्रतिशत हिस्सा ही उपयोग में लाया जाएगा। चिन्हित क्षेत्र में वृक्षों की अनुमानित संख्या 18.65 लाख है, किंतु सरकार ने इसे न्यूनतम रखने का प्रयास किया है और अधिकतम 7.11 लाख वृक्ष ही काटे जाने की संभावना है, जो 49.86 वर्ग किमी वन क्षेत्र में विस्तृत हैं। वृक्षों की यह कटाई एक साथ न होकर, विभिन्न परियोजनाओं के चरणबद्ध विकास के अनुरूप क्रमबद्ध तरीके से की जाएगी। पर्यावरणीय संतुलन सुनिश्चित करने हेतु 65.99 वर्ग किमी क्षेत्र को 'ग्रीन जोन' के रूप में संरक्षित रखा जाएगा, जहाँ एक भी पेड़ नहीं काटा जाएगा। चूँकि द्वीपों पर पहले से ही 75 प्रतिशत से अधिक वन क्षेत्र उपलब्ध है, अतः नियमों के अनुसार वन क्षेत्र को होने वाली क्षति की भरपाई का कार्य हरियाणा में किया जा रहा है। इसके लिए प्रथम चरण के 48.65 वर्ग किलोमीटर वन डायवर्जन के बदले हरियाणा में 97.30 वर्ग किलोमीटर भूमि को वनीकरण हेतु चिन्हित किया गया है।  पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपनी अटूट प्रतिबद्धता दोहराते हुए, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में 'एक पेड़ माँ के नाम' अभियान के अंतर्गत अब तक 2.4 मिलियन पौधे रोपे जा चुके हैं।

जनजातीय कल्याण एवं सामाजिक सरोकार

ग्रेट निकोबार द्वीप समूह, मंगोलॉयड मूल की दो प्रमुख जनजातियों का निवास स्थल है। यहाँ शोंपेन समुदाय (लगभग 237 सदस्य) निवास करते हैं, जो मुख्य रूप से शिकार और संग्राहक हैं। इनके साथ ही यहाँ निकोबारी समुदाय (लगभग 1,094 सदस्य) भी रहते हैं, जो तटीय बस्तियों में बसे हुए हैं और अपनी आजीविका के लिए मुख्य रूप से मछली पकड़ने पर निर्भर हैं। ग्रेट निकोबार परियोजना की रूपरेखा अत्यंत सूक्ष्मता और संवेदनशीलता के साथ तैयार की गई है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि निकोबारी और शोंपेन समुदायों को अपने मूल स्थान से विस्थापित न होना पड़े। परियोजना क्षेत्र के भीतर जनजातीय आवास केवल न्यू चिंगेन और राजीव नगर में स्थित हैं और प्रशासन ने आधिकारिक तौर पर यह स्पष्ट कर दिया है कि इन समुदायों के पुनर्वास या विस्थापन का कोई भी प्रस्ताव नहीं है।

ग्रेट निकोबार परियोजना, शोंपेन नीति 2015 और जरावा नीति 2004 के सिद्धांतों के पूरी तरह अनुरूप है। ये नीतियां यह अनिवार्य करती हैं कि किसी भी बड़े स्तर के विकास प्रस्ताव में 'विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों' (पीवीटीजी) के कल्याण और उनकी अखंडता को सर्वोपरि प्राथमिकता दी जाए तथा एक व्यवस्थित परामर्श प्रक्रिया का पालन किया जाए। जनजातीय हितों की सुरक्षा हेतु, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा एक 'स्वतंत्र निगरानी समिति' का गठन अनिवार्य किया गया है। यह समिति निर्माण और संचालन—दोनों चरणों के दौरान शोंपेन और निकोबारी समुदायों को प्रभावित करने वाले विषयों की कड़ी निगरानी करेगी। इसके अतिरिक्त, समुदायों की सुरक्षा, संरक्षण और सर्वांगीण कल्याण सुनिश्चित करने के लिए जनजातीय कार्य मंत्रालय, जनजातीय कल्याण निदेशालय, अंडमान आदिम जनजाति विकास समिति (एएजेवीएस) और भारतीय मानव विज्ञान सर्वेक्षण (एएनएसआई) जैसे विशेषज्ञ संस्थानों के साथ विस्तृत परामर्श किया गया है।

परियोजना के कार्यान्वयन का ढांचा संविधान के अनुच्छेद 338ए (9) के प्रावधानों के पूर्णतः अनुरूप है, जिसमें क्षेत्र के अनुसूचित जनजातियों और'विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों के हितों के संरक्षण पर विशेष बल दिया गया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह प्रशासन ने इस विकास परियोजना के क्रियान्वयन के अतिरिक्त इन जनजातियों को प्रभावित करने वाला कोई भी नया नीतिगत कदम नहीं उठाया है। यह इस तथ्य को पुष्ट करता है कि पूरी योजना प्रक्रिया के केंद्र में जनजातीय अधिकार और उनका कल्याण सर्वोपरि बना हुआ है।

वर्तमान में, ग्रेट निकोबार द्वीप का 751.070 वर्ग किमी क्षेत्र आधिकारिक रूप से 'जनजातीय आरक्षित क्षेत्र' के रूप में चिन्हित है। विकास परियोजनाओं के लिए प्रस्तावित कुल 166.10 वर्ग किमी भूमि में से, 84.10 वर्ग किमी क्षेत्र जनजातीय आरक्षित क्षेत्र के अंतर्गत आता है। हालांकि, इस हिस्से में से 11.032 वर्ग किमी भूमि का वर्ष 1972 से ही नियमितीकरण किया जा चुका है और इसे 'राजस्व भूमि' के रूप में उपयोग किया जा रहा है। परिणामस्वरूप, प्रभावी रूप से शेष 73.07 वर्ग किमी क्षेत्र को परियोजना के उद्देश्यों हेतु डी-नोटिफाई किया जा रहा है। इसकी क्षतिपूर्ति के लिए, 76.98 वर्ग किमी नई भूमि को पुनः 'जनजातीय आरक्षित क्षेत्र' के रूप में अधिसूचित किया जा रहा है। इस प्रकार, जनजातीय आरक्षित क्षेत्र में 3.912 वर्ग किमी की शुद्ध वृद्धि होगी। विशेष रूप से, पहले चरण में केवल 40.01 वर्ग किमी जनजातीय क्षेत्र परियोजना में शामिल है, जिसमें से 11.032 वर्ग किमी भूमि 1972 से ही राजस्व उपयोग के अधीन है।

जोखिम मूल्यांकन एवं आपदा प्रबंधन

भौगोलिक रूप से यह द्वीप भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील और चक्रवात संभावित क्षेत्र में स्थित है। इसे ध्यान में रखते हुए, एक व्यापक जोखिम आकलन अध्ययन किया गया है, जिसमें प्राकृतिक आपदाओं (सुनामी, भूकंप, चक्रवात) के साथ-साथ मानव-जनित जोखिमों (औद्योगिक खतरे, दुर्घटनाएं) को भी शामिल किया गया है। आपात स्थितियों के लिए पूर्ण तैयारी सुनिश्चित करने हेतु एक संवेदनशीलता एवं आपदा प्रबंधन योजना तैयार की गई है। इसके अतिरिक्त, गैस और सौर ऊर्जा पर आधारित एक हाइब्रिड पावर प्लांट की स्थापना की जा रही है। यह न केवल कार्बन उत्सर्जन को कम करेगा, बल्कि किसी भी संकट की स्थिति में बिजली आपूर्ति की निरंतरता और आपदा-सक्षमता सुनिश्चित करेगा।

निष्कर्ष

ग्रेट निकोबार परियोजना इस बात का एक उत्कृष्ट उदाहरण है कि किस प्रकार समग्र विकास के माध्यम से आर्थिक प्रगति, पर्यावरणीय संरक्षण और सामाजिक समावेश के बीच एक आदर्श संतुलन स्थापित किया जा सकता है। यह परियोजना हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, समुद्री उपस्थिति और रणनीतिक पहुंच को मजबूत करने के लिए ग्रेट निकोबार की महत्वपूर्ण स्थिति का लाभ उठाती है और साथ ही, इसमें पर्यावरण सुरक्षा और जनजातीय कल्याण के प्रभावी सुरक्षा तंत्र को भी समाहित किया गया है। वन्यजीव संरक्षण, वन क्षेत्र को होने वाली क्षति की भरपाई, आपदा आपदा की तैयारी और सामाजिक समावेश के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के माध्यम से, सरकार ने यह सिद्ध कर दिया है कि विकास का मार्ग पर्यावरण की कीमत पर नहीं, बल्कि उसके साथ समन्वय बिठाकर प्रशस्त किया जा सकता है।

अंततः, यह परियोजना पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में भविष्य की बड़े स्तर की इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए एक आदर्श मॉडल प्रस्तुत करती है। यह सिद्ध करती है कि अर्थव्यवस्था और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक बन सकते हैं, ताकि राष्ट्रीय और वैश्विक हितों की सर्वोत्तम सेवा की जा सके।

संदर्भ सूची:

नीति आयोग

Post a Comment

0 Comments