क्षेत्रीय अस्पताल कुल्लू में हाल ही में हुई घटना और उसके बाद उत्पन्न विवाद के बीच हिमाचल प्रदेश मेडिकल ऑफिसर्स एसोसिएशन (HMOA) ने आम जनता के लिए एक विस्तृत जनहित प्रेस विज्ञप्ति जारी कर मातृ मृत्यु (Maternal Mortality) से जुड़े तथ्यों को समझने और अफवाहों से बचने की अपील की है।
HMOA के प्रेस सचिव डॉ. विजय कुमार राय द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि किसी भी माँ की मृत्यु परिवार और समाज के लिए अत्यंत दुखद होती है। हालांकि, बिना निष्पक्ष जांच और वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर डॉक्टरों या स्वास्थ्यकर्मियों को दोषी ठहराना न तो उचित है और न ही न्यायसंगत।
एसोसिएशन ने स्पष्ट किया कि मातृ मृत्यु अनुपात (Maternal Mortality Ratio - MMR) वह संख्या है, जिसमें गर्भावस्था, प्रसव या प्रसव के 42 दिनों के भीतर गर्भावस्था अथवा उसके प्रबंधन से संबंधित कारणों से होने वाली मातृ मृत्यु को प्रति एक लाख जीवित जन्म पर मापा जाता है।
प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार भारत ने पिछले तीन दशकों में मातृ मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी दर्ज की है। वर्ष 1990 में जहां MMR 437 था, वहीं नवीनतम सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (2021–23) के अनुसार यह घटकर 88 प्रति एक लाख जीवित जन्म रह गया है। HMOA ने इसे संस्थागत प्रसव, नियमित प्रसव पूर्व जांच (ANC), जननी सुरक्षा योजनाओं, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों तथा बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं का परिणाम बताया। साथ ही यह भी कहा कि भारत का लक्ष्य वर्ष 2030 तक MMR को 70 से नीचे लाना है।
एसोसिएशन ने मातृ मृत्यु के प्रमुख कारणों में प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव, गर्भावस्था में उच्च रक्तचाप एवं ईक्लेम्प्सिया, संक्रमण, गंभीर एनीमिया, प्रसव में रुकावट, असुरक्षित गर्भपात तथा पहले से मौजूद गंभीर बीमारियों को शामिल किया है। इसके अतिरिक्त ‘थ्री डिलेज मॉडल’—अस्पताल जाने का निर्णय लेने में देरी, अस्पताल तक पहुंचने में देरी और समय पर उपचार मिलने में देरी—को भी महत्वपूर्ण कारण बताया गया है, जिनमें से कई परिस्थितियां चिकित्सकों के नियंत्रण से बाहर होती हैं।
HMOA ने कहा कि चिकित्सा विज्ञान में कोई भी डॉक्टर 100 प्रतिशत सफलता की गारंटी नहीं दे सकता। कई मरीज अत्यंत गंभीर अवस्था में अस्पताल पहुंचते हैं और कई बार सभी आधुनिक उपचारों तथा विशेषज्ञों के अथक प्रयासों के बावजूद भी मरीज का जीवन नहीं बचाया जा सकता। ऐसी परिस्थितियों में प्रत्येक मातृ मृत्यु को चिकित्सा लापरवाही मानना उचित नहीं है।
हालांकि, एसोसिएशन ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी मामले में चिकित्सा लापरवाही या निर्धारित उपचार मानकों के उल्लंघन के प्रमाण मिलते हैं, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए तथा कानून के अनुसार उचित कार्रवाई भी की जानी चाहिए। लेकिन केवल भावनाओं, अधूरी जानकारी या सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाओं के आधार पर डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों को दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं है।
HMOA ने जनता से नियमित प्रसव पूर्व जांच कराने, एनीमिया का समय पर उपचार करवाने, संस्थागत प्रसव को प्राथमिकता देने, खतरे के लक्षण दिखाई देने पर तुरंत अस्पताल पहुंचने तथा डॉक्टरों एवं स्वास्थ्यकर्मियों के साथ सहयोग बनाए रखने की अपील की है।
प्रेस विज्ञप्ति के अंत में एसोसिएशन ने कहा कि हर मातृ मृत्यु स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए आत्ममंथन और सुधार का अवसर होती है, लेकिन मरीज और डॉक्टर के बीच विश्वास बनाए रखना तथा किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तथ्यों और निष्पक्ष जांच का सम्मान करना समाज के हित में आवश्यक है।

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