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जायका (कृषि) द्वारा स्वयं सहायता समूहों के सदस्यों के लिए भूमिका एवं उत्तरदायित्व पर प्रशिक्षण आयोजित



खण्ड परियोजना प्रबंधन इकाई, हिमाचल प्रदेश फसल विविधीकरण प्रोत्साहन परियोजना (चरण II) जायका कुल्लू,  द्वारा कृषि विज्ञान केंद्र, बजौरा में  जिला कुल्लू के अंतर्गत आने वाली 14 उप-परियोजनाओं के  स्वयं सहायता समूहों  के 42 सदस्यों ( 36 महिला व 6 पुरुष)  के लिए एक दिवसीय भूमिका एवं उत्तरदायित्व कार्यक्रम  का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम का शुभारम्भ खण्ड परियोजना प्रबंधक, कुल्लू, डॉ. जयंत रत्ना ने किया।  उन्होंने स्वयं सहायता समूहों की परियोजना में महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि समूह के सदस्य किसानों के बीच परियोजना की विभिन्न गतिविधियों के प्रभावी क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण सहयोगी हैं। उन्होंने बताया कि समूहों की सक्रिय भागीदारी से किसानों तक आधुनिक कृषि तकनीकों, फसल प्रबंधन, पोषण, सिंचाई, प्राकृतिक संसाधन संरक्षण तथा आजीविका संवर्धन से संबंधित जानकारी प्रभावी रूप से पहुंचाई जा सकती है। उन्होंने समूहों को परियोजना के उद्देश्यों के अनुरूप कार्य करते हुए किसानों को संगठित करने तथा सामुदायिक स्तर पर नेतृत्व विकसित करने का आह्वान किया।
 ने कहा कि किसी भी स्वयं सहायता समूह की सफलता उसके सदस्यों के आपसी विश्वास, सहयोग, अनुशासन एवं पारदर्शिता पर निर्भर करती है। उन्होंने बताया कि समूह केवल बचत एवं ऋण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण महिलाओं के सामाजिक एवं आर्थिक सशक्तिकरण का एक प्रभावी माध्यम है। उन्होंने समूह के प्रत्येक सदस्य की भूमिका एवं उत्तरदायित्वों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सक्रिय सहभागिता, नियमित बैठक, समय पर बचत, पारदर्शी लेखा-जोखा तथा सामूहिक निर्णय समूह को मजबूत बनाते हैं। प्रशिक्षण के दौरान उन्होंने स्वयं सहायता समूहों एवं बैंक लिंकेज से संबंधित महत्वपूर्ण पहलुओं, बैंकिंग प्रक्रिया में आने वाली सामान्य समस्याओं एवं उनके समाधान, नेतृत्व विकास, टीम बिल्डिंग, प्रेरणा (मोटिवेशन), समूह गतिशीलता तथा प्रभावी संचार (कम्युनिकेशन स्किल) पर विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने प्रतिभागियों को बताया कि एक सशक्त नेतृत्व एवं बेहतर टीम भावना से समूह की कार्यक्षमता और आत्मनिर्भरता में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। डॉ.  रत्ना ने उत्पादों की गुणवत्ता, मार्केटिंग, ब्रांडिंग, पैकेजिंग एवं लेबलिंग, मार्केट इंटेलिजेंस तथा विभिन्न मंडियों के वर्गीकरण जैसे विषयों पर भी विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि यदि स्वयं सहायता समूह अपने उत्पादों की उचित पैकेजिंग, आकर्षक ब्रांडिंग तथा बाजार की मांग के अनुरूप विपणन रणनीति अपनाते हैं तो उन्हें बेहतर मूल्य प्राप्त हो सकता है तथा उनकी आय में वृद्धि संभव है।
जिला परियोजना प्रबंधन इकाई मंडी से विषयवाद विशेषज्ञ डॉ. खूब राम ठाकुर ने स्वयं सहायता समूहों के सदस्यों को उनकी भूमिका एवं उत्तरदायित्वों के संबंध में विस्तार से जानकारी प्रदान की। उन्होंने स्वयं सहायता समूहों की संगठनात्मक संरचना, समूह संचालन, सामूहिक निर्णय प्रक्रिया, वित्तीय अनुशासन, अभिलेख संधारण तथा परियोजना गतिविधियों में सक्रिय सहभागिता के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने फसल विविधीकरण, किसानों की आय में वृद्धि तथा समूह आधारित कृषि विकास के लाभों पर चर्चा करते हुए कहा कि स्वयं सहायता समूह ग्रामीण क्षेत्रों में तकनीकी जानकारी के प्रसार, सामुदायिक सहभागिता तथा किसानों को परियोजना से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने प्रतिभागियों का आह्वान किया कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में किसानों को परियोजना की गतिविधियों से जोड़ते हुए आधुनिक एवं टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रेरित करें।डॉ. सुरेंद्र बंसल, विषय विशेषज्ञ (पशु चिकित्सा एवं मेडिसिन) ने स्वयं सहायता समूहों के सदस्यों को डेयरी विकास एवं पशुपालन से संबंधित विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तृत जानकारी प्रदान की। उन्होंने दुधारू पशुओं के संतुलित पोषण, वैज्ञानिक डेयरी प्रबंधन, स्वच्छ दुग्ध उत्पादन, पशुओं के उचित रख-रखाव तथा दूध उत्पादन बढ़ाने के प्रभावी उपायों पर प्रकाश डाला। उन्होंने पशुओं में होने वाली सामान्य बीमारियों, के लक्षण, रोकथाम, नियमित टीकाकरण, कृमिनाशन तथा समय-समय पर स्वास्थ्य परीक्षण के महत्व के बारे में भी विस्तार से जानकारी दी।  उन्होंने बताया कि वैज्ञानिक पशुपालन एवं बेहतर डेयरी प्रबंधन अपनाकर पशुपालक अपनी आय में वृद्धि कर सकते हैं तथा गुणवत्तापूर्ण दुग्ध उत्पादन के माध्यम से स्वरोजगार एवं आजीविका के बेहतर अवसर प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने स्वयं सहायता समूहों से पशुपालन को कृषि के साथ जोड़कर अतिरिक्त आय का सशक्त माध्यम बनाने का भी आह्वान किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने प्रतिभागियों को किसान सारथी  ऐप से भी जोड़ा तथा इसके माध्यम से पशुपालन एवं कृषि से संबंधित तकनीकी सलाह, नवीनतम जानकारी, सरकारी योजनाओं तथा विशेषज्ञों के मार्गदर्शन का लाभ उठाने के लिए प्रेरित किया।
 इसके उपरांत डॉ. राधिका नेगी, विषय विशेषज्ञ (वैज्ञानिक, सब्जी विज्ञान) ने रसायन मुक्त सब्जियों के उत्पादन, फसल विविधीकरण तथा विदेशी (एग्जॉटिक) सब्जियों की खेती की संभावनाओं पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि रसायन मुक्त खेती से उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार होने के साथ-साथ किसानों को बेहतर बाजार मूल्य प्राप्त हो सकता है। उन्होंने जैविक खाद, कम्पोस्ट तथा प्राकृतिक कीटनाशकों के उपयोग को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया। इसके अतिरिक्त उन्होंने स्वयं सहायता समूहों द्वारा कृषि उत्पादों का मूल्य संवर्धन कर अचार, जैम एवं अन्य प्रसंस्कृत उत्पाद तैयार कर स्वयं के ब्रांड नाम से विपणन करने के लाभों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि ब्रांडिंग एवं आकर्षक पैकेजिंग के माध्यम से उत्पादों का मूल्य बढ़ाया जा सकता है, जिससे समूहों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है। उन्होंने वर्तमान समय में जैविक एवं रसायन मुक्त उत्पादों की बढ़ती उपभोक्ता मांग पर भी चर्चा की तथा इसे स्वयं सहायता समूहों के लिए एक बेहतर आजीविका अवसर बताया। उन्होंने बताया कि लाहौल घाटी के स्वयं सहायता समूहों द्वारा सी-बकथॉर्न  से विभिन्न मूल्य संवर्धित उत्पाद तैयार करने के सफल उदाहरण साझा किए। 
 विकास खंड कार्यालय भुंतर से  राजेंद्र दड़वाल ने दीनदयाल अंत्योदय योजना–राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन  के विभिन्न प्रावधानों एवं उद्देश्यों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय की एक महत्वाकांक्षी योजना है, जिसका उद्देश्य स्वयं सहायता समूहों  के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को संगठित कर उन्हें आर्थिक एवं सामाजिक रूप से सशक्त बनाना है। उन्होंने स्वयं सहायता समूहों के गठन, क्षमता निर्माण, आजीविका संवर्धन, स्वरोजगार के अवसरों, बैंक ऋण एवं वित्तीय सेवाओं तक आसान पहुंच तथा विभिन्न सरकारी योजनाओं से समूहों को जोड़ने की प्रक्रिया पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि  के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाकर उनकी आय में वृद्धि, वित्तीय समावेशन तथा ग्रामीण क्षेत्रों के समग्र एवं सतत विकास को बढ़ावा दिया जा रहा है।
 डॉ. रमेश लाल, वैज्ञानिक (कीट विज्ञान) ने स्वयं सहायता समूहों के सदस्यों को मधुमक्खी पालन के महत्व एवं इसकी वैज्ञानिक तकनीकों के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान की। उन्होंने मधुमक्खी पालन की स्थापना, कॉलोनी प्रबंधन, मधुमक्खियों की देखभाल, शहद उत्पादन तथा शहद के संग्रहण, प्रसंस्करण (हनी प्रोसेसिंग), गुणवत्ता नियंत्रण, पैकेजिंग एवं विपणन की संपूर्ण प्रक्रिया पर  चर्चा की। उन्होंने बताया कि मधुमक्खी एक अत्यंत लाभकारी कीट है, जो फसलों में परागण के माध्यम से उत्पादन एवं गुणवत्ता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसके अतिरिक्त उन्होंने अन्य लाभकारी कीटों के बारे में भी जानकारी दी, जो हानिकारक कीटों के नियंत्रण में सहायक होते हैं तथा कृषि पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। उन्होंने किसानों को मधुमक्खी पालन को कृषि के साथ जोड़कर अतिरिक्त आय का प्रभावी स्रोत बनाने तथा फसलों में बेहतर परागण के माध्यम से उत्पादकता बढ़ाने के लिए प्रेरित किया।  डॉ. सुरेंद्र कुमार ठाकुर, कार्यक्रम समन्वयक, कृषि विज्ञान केंद्र, बजौरा ने कृषि विज्ञान केंद्र की विभिन्न गतिविधियों एवं किसानों के लिए उपलब्ध तकनीकी सेवाओं की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कृषि विज्ञान केंद्र, बजौरा जिला कुल्लू के समस्त किसानों के लिए कृषि, बागवानी, पशुपालन, खाद्य प्रसंस्करण, उद्यमिता विकास तथा कृषि आधारित आजीविका से संबंधित तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण एवं प्रदर्शन कार्यक्रमों का संचालन करता है। उन्होंने स्वयं सहायता समूहों को कृषि उत्पादों के मूल्य संवर्धन (वैल्यू एडिशन), खाद्य प्रसंस्करण, गुणवत्ता युक्त उत्पाद निर्माण, पैकेजिंग एवं विपणन अपनाकर अपनी आय में वृद्धि करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने पशुपालन, कृषि एवं प्रसंस्करण गतिविधियों को एकीकृत रूप से अपनाने पर बल देते हुए कहा कि इससे ग्रामीण परिवारों को वर्षभर रोजगार एवं अतिरिक्त आय के अवसर प्राप्त हो सकते हैं। उन्होंने स्वयं सहायता समूहों की सामूहिक शक्ति, आत्मनिर्भरता, महिला सशक्तिकरण तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने प्रतिभागियों से कृषि विज्ञान केंद्र द्वारा समय-समय पर आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों, तकनीकी परामर्श सेवाओं एवं विभिन्न प्रदर्शन गतिविधियों का अधिकाधिक लाभ उठाने का आह्वान किया।
इस अवसर पर जिला परियोजना प्रबंधन इकाई मंडी से निर्माण अभियंता अंकुश शर्मा, खण्ड परियोजना प्रबंधन इकाई, कुल्लू से कृषि अधिकारी संजय कुमार, कृषि प्रसार अधिकारी मोनिका सैनी एवं आई.ई.सी. समन्वयक युवराज भी उपस्थित रहे।

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