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भारत की अंतरिक्ष यात्रा


भारत के अंतरिक्ष भविष्य का निर्माण


पिछले 12 वर्षों में भारत की अंतरिक्ष यात्रा ‘विश्वास, विकास और जनकल्याण’ की भावना को प्रतिबिंबित कर रही है। ‘आत्मनिर्भर भारत’, ‘मेक इन इंडिया’ और ‘विकसित भारत 2047’ की कल्‍पना से प्रेरित होकर भारत दुनिया की अग्रणी अंतरिक्ष शक्तियों में उभरकर सामने आया है। इस अवधि की प्रमुख उपलब्धियों में चंद्रयान-3 का चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के निकट सफलतापूर्वक उतरना, आदित्य-एल1 का सौर मिशन तथा गगनयान और राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन की तैयारियाँ शामिल हैं। अंतरिक्ष क्षेत्र में स्टार्टअप्स की संख्या जो 2014 में केवल एक थी, फरवरी 2026 तक बढ़कर 400 से अधिक हो गई है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के उदार बनाए गए नियमों, निजी क्षेत्र की बढ़ी हुई भागीदारी तथा एनएसआईएल (न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड) के नेतृत्व में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के व्यावसायीकरण ने इस क्षेत्र की प्रगति को नई गति दी है। ये उपलब्धियाँ एक ऐसे आत्मविश्वासी और आत्मनिर्भर भारत की तस्वीर प्रस्तुत करती हैं, जो विकास, वैश्विक साझेदारी और समावेशी प्रगति के लिए अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का प्रभावी उपयोग कर रहा है।

वैश्विक अंतरिक्ष शक्ति के रूप में भारत का उदय

पिछले बारह वर्षों में भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम राष्ट्रीय आत्मविश्वास, तकनीकी आत्मनिर्भरता और वैश्विक महत्वाकांक्षा का प्रतीक बनकर उभरा है। एक वैज्ञानिक प्रयास के रूप में शुरू हुई यात्रा, आज एक ऐसी रणनीतिक राष्ट्रीय संपदा में परिवर्तित हो चुकी है, जो विकास को गति देती है, राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करती है, नवाचार को बढ़ावा देती है और विश्व पटल पर भारत की प्रतिष्ठा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाती है। यह यात्रा ‘विश्वास के, निर्माण के और जनकल्याण के 12 वर्ष’ की भावना को साकार करती है—उपलब्धियों के माध्यम से विश्वास का निर्माण, नवाचार के जरिए नए अवसरों उत्‍पन्‍न करना और ऐसे लाभ सुनिश्चित करना जो प्रत्येक नागरिक तक पहुँचें।

इस परिवर्तन को तीन प्रमुख आधारस्तंभों ने आकार दिया है। पहला, भारत की अंतरिक्ष क्षमता ने ऐतिहासिक अंतरिक्ष अभियानों, उन्नत प्रक्षेपण प्रणालियों और स्वदेशी प्रौद्योगिकियों के माध्यम से देश की पहुँच पृथ्वी से कहीं आगे तक विस्तारित की है। इसके अतिरिक्‍त, राष्ट्रीय क्षमता निर्माण के अंतर्गत अंतरिक्ष-आधारित ऐप्‍लीकेशनों का उपयोग कर सुशासन, संपर्क, आपदा प्रबंधन, कृषि, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और आर्थिक विकास को नई मजबूती प्रदान की गई है। वैश्विक साझेदारी और सहयोगात्मक नेतृत्व ने भारत को एक विश्वसनीय अंतरिक्ष भागीदार के रूप में स्थापित किया है। इससे अंतरराष्ट्रीय सहयोग का दायरा बढ़ा है तथा अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण और जिम्मेदार उपयोग के प्रति भारत की भूमिका और अधिक सुदृढ़ हुई है।

 

ये उपलब्धियाँ उस राष्ट्र की यात्रा को दर्शाती हैं, जो न केवल अंतरिक्ष के नए आयामों को छू रहा है, बल्कि अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का उपयोग अपने नागरिकों को सशक्त बनाने, अपनी संस्थाओं को मजबूत करने और वैश्विक मंच पर भारत की प्रतिष्ठा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने के लिए भी कर रहा है। यह एक ऐसी यात्रा है, जो राष्ट्रीय उद्देश्य से प्रेरित है और प्रत्येक नागरिक के जीवन को बेहतर बनाने पर केन्द्रित है।

भारत की अंतरिक्ष क्षमता : पृथ्वी से आगे नई ऊँचाइयों की ओर

पिछले दशक में भारत ने अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम के दायरे का लगातार विस्तार किया है। इसकी शुरुआत अंतरिक्ष अन्वेषण पर केन्‍द्रित प्रयासों से हुई थी, जो अब वैज्ञानिक अनुसंधान को आगे बढ़ाने, अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों के विकास और राष्ट्रीय क्षमताओं को सुदृढ़ करने के एक व्यापक प्रयास में परिवर्तित हो चुका है। आज भारत गहन अंतरिक्ष अन्वेषण, अंतरिक्ष विज्ञान, मानव अंतरिक्ष उड़ान और कक्षीय अवसंरचना के क्षेत्रों में महत्वाकांक्षी लक्ष्यों की दिशा में कार्य कर रहा है। ये उपलब्धियाँ भारत के बढ़ते आत्मविश्वास, तकनीकी परिपक्वता और वैश्विक अंतरिक्ष इकोसिस्‍टम में उसकी दीर्घकालिक भूमिका की कल्‍पना को दर्शाती हैं।

 

चंद्र अन्वेषणचंद्रयान कार्यक्रम  

भारत की चंद्र यात्रा वैज्ञानिक खोज और तकनीकी प्रगति के प्रति एक स्‍थायी प्रतिबद्धता को दर्शाती है। इसकी नींव 2008 में चंद्रयान-1 के साथ रखी गई थी, जो भारत का चंद्रमा पर पहला मिशन था। इस मिशन ने चंद्रमा की सतह पर जल अणुओं और हाइड्रॉक्सिल की उपस्थिति के साक्ष्य खोजकर चंद्रमा के संसाधनों की वैश्विक समझ को बदल दिया। इसकी चन्‍द्र प्रभाव जांच (मून इम्पैक्ट प्रोब) ने चंद्रमा के बाह्यमंडल के बारे में भी महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की। इसके बाद 2019 में प्रक्षेपित चंद्रयान-2 ने भारत के चन्‍द्र कार्यक्रम को और मजबूत किया। 100 किलोमीटर की ऊँचाई से इसने चन्‍द्रमा की सतह की अत्यंत उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाली कुछ बेहतरीन छवियाँ प्रदान कीं और 30 सेंटीमीटर तक सूक्ष्म विवरणों को भी पकड़ा। चंद्रयान-1 और चंद्रयान-2 ने भारत को वैश्विक चन्‍द्र विज्ञान में एक गंभीर और महत्वपूर्ण योगदानकर्ता के रूप में स्थापित किया तथा भविष्य के अन्वेषण के लिए मजबूत आधार तैयार किया।  

यह आधार 23 अगस्त 2023 को एक ऐतिहासिक अभूतपूर्व उपलब्धि के रूप में सामने आया। चंद्रयान-3 ने भारत को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के निकट सफलतापूर्वक सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला विश्व का पहला देश और अमेरिका, रूस और चीन के बाद चन्‍द्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला चौथा देश बना दिया। विक्रम लैंडर ने 69.3° दक्षिण अक्षांश पर उतरकर वह क्षेत्र छुआ जहाँ पहले कोई भी अंतरिक्ष यान नहीं पहुँचा था। इसके वैज्ञानिक उपकरणों ने स्थल पर (इन-सिटू) अध्ययन किए और प्रत्यक्ष तत्वीय विश्लेषण के माध्यम से सल्फर की उपस्थिति की पुष्टि की। भारत की चन्‍द्र महत्वाकांक्षाएँ लगातार बढ़ रही हैं। 2027 के लिए प्रस्तावित चंद्रयान-4 का उद्देश्य चंद्रमा पर उतरकर नमूने एकत्र करना और उन्हें पृथ्वी पर वापस लाना है। चंद्रयान-5/एलयूपीईएक्स (लूनर पोलर एक्‍सप्‍लोरेशन) मिशन चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के नजदीक स्थायी रूप से छाया वाले क्षेत्रों में जल और अन्य वाष्पशील पदार्थों की खोज करेगा, जिससे भारत चंद्रमा अन्वेषण के अगले युग में और गहराई तक प्रवेश करेगा।

 

मंगल ऑर्बिटर मिशन या मंगलयान

मार्स ऑर्बिटर मिशन, जिसे ‘मंगलयान’ के नाम से जाना जाता है, ने भारत को ग्रहों के बीच अन्वेषण में प्रवेश दिलाया। 24 सितम्‍बर 2014 को इस अंतरिक्ष यान ने सफलतापूर्वक मंगल की कक्षा में प्रवेश किया, जिससे भारत अपने पहले ही प्रयास में मंगल तक पहुँचने वाला विश्व का पहला देश बन गया। इस उपलब्धि के साथ इसरो अमेरिका की नासा, रूस की रोसकॉसमॉस और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के बाद मंगल की कक्षा में किसी अंतरिक्ष यान को स्थापित करने वाली दुनिया की चौथी अंतरिक्ष एजेंसी बन गया। मूल रूप से छह महीने के मिशन के लिए तैयार किया गया मंगलयान आठ वर्षों से अधिक समय तक सक्रिय रहा, जो अपेक्षाओं से कहीं अधिक था। इस मिशन ने मंगल के वायुमंडल, बाह्यमंडल, सतही संरचनाओं और सूर्य के उत्सर्जित आवेशित कणों की धारा के लगातार ग्रहों, धूमकेतु या अंतरिक्ष में अन्‍य खगोलीय पिंडों के बीच होने टक्करों पर मूल्यवान वैज्ञानिक आंकड़े प्रदान किए। इसके अलावा अपने वैज्ञानिक योगदानों से आगे बढ़कर, मंगलयान ने जटिल गहन अंतरिक्ष मिशनों को अत्यंत दक्षता के साथ संचालित करने की भारत की क्षमता को प्रदर्शित किया और ग्रहों के अन्वेषण में देश को एक विश्वसनीय भागीदार के रूप में स्थापित किया।

आदित्य-एल1: भारत की पहली सौर वेधशाला

आदित्य-एल1 के साथ भारत ने ग्रहों के अन्वेषण से आगे बढ़ते हुए अपनी अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाओं का विस्तार किया, जो देश का पहला समर्पित सौर मिशन है। 2023 में प्रक्षेपित इस अंतरिक्ष यान को सफलतापूर्वक सूर्य-पृथ्वी एल1 लैग्ररेंज प्‍वाइंट के चारों ओर प्रभामंडल कक्षा में स्थापित किया गया, जो पृथ्वी से लगभग 1.5 मिलियन किलोमीटर दूर है। यह विशिष्ट स्थिति सूर्य और उसकी गतिशील गतिविधियों के निरंतर और निर्बाध अवलोकन को संभव बनाती है। यह मिशन सूर्य के कोरोना, सौर वायु और अंतरिक्ष मौसम संबंधी घटनाओं का अध्ययन करता है, जो पृथ्वी के पर्यावरण और तकनीकी प्रणालियों को प्रभावित करते हैं। आदित्य-एल1 को प्रस्ताव-आधारित वेधशाला के रूप में राष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय के लिए भी उपलब्ध कराया गया है। वैज्ञानिक आँकड़े नियमित रूप से सार्वजनिक किए जाते हैं, जिससे वैश्विक सौर अनुसंधान को मजबूती मिलती है। अब तक 27 टेराबाइट से अधिक सौर अवलोकन डेटा साझा किया जा चुका है, जिससे यह मिशन अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक जानकारी में एक महत्वपूर्ण योगदानकर्ता बन गया है।

 

अंतरिक्ष खगोल विज्ञान और अंतरिक्ष डॉकिंग : क्षमताओं की सीमा का विस्तार

भारत ने खगोल विज्ञान और कक्षा-आधारित प्रौद्योगिकी प्रदर्शन के माध्यम से उन्नत अंतरिक्ष विज्ञान में अपनी स्थिति को और मजबूत किया है। भारत की पहली बहु-वैवलैंग्‍थ अंतरिक्ष वेधशाला, एस्ट्रोसैट ने सितम्‍बर 2025 में कक्षा में अपने 10 वर्ष पूरे किए और इसने कई महत्वपूर्ण वैज्ञानिक खोजों में योगदान दिया है। एक जनवरी 2024 को प्रक्षेपित एक्सपोसैट ने एक्स-रे खगोल विज्ञान में भारत की क्षमताओं का और विस्तार किया है। ये दोनों मिशन प्रस्ताव-आधारित वेधशालाओं के रूप में विश्वभर के शोधकर्ताओं की सेवा करते हुए निरन्‍तर कार्य कर रहे हैं।

भारत ने जनवरी 2025 में स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट (स्‍पेडेक्‍स) के माध्यम से एक महत्वपूर्ण तकनीकी सफलता भी हासिल की। इस मिशन ने भारत को अमेरिका, रूस और चीन के बाद अंतरिक्ष में स्वायत्त डॉकिंग और अनडॉकिंग का प्रदर्शन करने वाला विश्व का चौथा देश बना दिया। इसरो ने डॉक किए गए उपग्रहों के बीच ऊर्जा स्थानांतरण का प्रदर्शन भी किया तथा सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण में रोबोटिक आर्म का परीक्षण किया। स्वदेशी ‘भारतीय डॉकिंग सिस्टम’ का सफल विकास एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, जो भारत के आगामी प्रमुख मिशनों—जैसे भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (बीएएस), चंद्रयान-4 और गगनयान—के निर्बाध संचालन को संभव बनाएगा। अधिक जानकारी के लिए पढ़ें: SpaDeX Mission: Revolutionising Space Exploration

शुक्र ऑर्बिटर मिशन : पृथ्वी के सबसे नजदीक ग्रह की खोज

चंद्रमा और मंगल पर अपनी उपलब्धियों के आधार पर भारत अब शुक्र ग्रह के लिए अपने पहले मिशन की तैयारी कर रहा है। भारत सरकार द्वारा अनुमोदित शुक्र ऑर्बिटर मिशन को मार्च 2028 में प्रक्षेपित करने का लक्ष्य रखा गया है। यह मिशन शुक्र ग्रह की भूगर्भीय संरचना, सतह की संरचना, वायुमंडल, आयनमंडल तथा पुनर्सतहीकरण प्रक्रियाओं का अध्ययन करेगा। वैज्ञानिक यह भी जांच करेंगे कि सूर्य की गतिविधियाँ इस ग्रह के वायुमंडल और निकट-अंतरिक्ष पर्यावरण को कैसे प्रभावित करती हैं। यह मिशन भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए एक महत्वपूर्ण तकनीकी छलांग होगी। इसमें एयरोब्रेकिंग और उन्नत थर्मल प्रबंधन प्रणालियों जैसी क्षमताओं का प्रयास किया जाएगा, ताकि शुक्र की अत्यंत कठिन परिस्थितियों में कार्य किया जा सके। इन तकनीकों का उपयोग इसरो द्वारा पहली बार किया जा रहा है और यह भारत की गहन अंतरिक्ष अन्वेषण तथा ग्रह विज्ञान में विशेषज्ञता को और मजबूत करेगा। 

गगनयान  भारत का प्रथम मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम

जनवरी 2019 में अनुमोदित इस मिशन का उद्देश्य तीन भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को लगभग 400 किलोमीटर की कक्षा में तीन दिन तक भेजना और फिर उन्हें सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर वापस लाना है। इस कार्यक्रम में दो मानव रहित मिशन और एक मानवयुक्त मिशन शामिल हैं। यह कार्यक्रम 2025 में अपने अंतिम चरण में प्रवेश कर चुका है। अंतरिक्ष अन्वेषण से आगे बढ़कर, गगनयान भारतीय उद्योग को सशक्त बना रहा है, नई प्रौद्योगिकियों का विकास कर रहा है और भारत को उन चुनिंदा देशों के और करीब ला रहा है, जिनके पास स्वतंत्र रूप से मनुष्यों को अंतरिक्ष में भेजने की क्षमता है।

क्या आप जानते हैं?

गगनयान की तैयारियों के अंतर्गत, भारत ने 2025 में अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के लिए इसरो-नासा समर्थित एक्सिओम-4 मिशन में भाग लिया। ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने 25 जून 2025 को फाल्कन 9 द्वारा प्रक्षेपित स्पेसएक्स ड्रैगन अंतरिक्ष यान में यात्रा की। इस मिशन के दौरान उन्होंने भारतीय अनुसंधान संस्थानों द्वारा विकसित सात सूक्ष्म-गुरुत्वाकर्षण (माइक्रोग्रैविटी) प्रयोग किए। इन अध्ययनों में मांसपेशियों के पुनर्जनन, शैवाल की वृद्धि, फसल की उपयुक्तता, सूक्ष्मजीवों की जीवित रहने की क्षमता, संज्ञानात्मक प्रदर्शन तथा अंतरिक्ष में साइनोबैक्टीरिया के व्यवहार का परीक्षण शामिल था। यह मिशन 15 जुलाई 2025 को सफलतापूर्वक अनडॉकिंग, पुनः प्रवेश और स्प्लैशडाउन के साथ संपन्न हुआ। अपने वैज्ञानिक परिणामों से आगे बढ़कर, एक्सिओम-4 मिशन ने भारत को अंतरिक्ष यात्री प्रशिक्षण, मानव अंतरिक्ष उड़ान प्रक्रियाओं, माइक्रोग्रैविटी अनुसंधान और अंतरराष्ट्रीय सहयोग में मूल्यवान परिचालन अनुभव प्रदान किया, जिससे देश की भविष्य की मानवयुक्त मिशनों के लिए तैयारी और अधिक सुदृढ़ हुई।  

 

राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन

भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (BAS) भारत का प्रस्तावित अंतरिक्ष स्टेशन है और ‘स्पेस विज़न 2047’ का एक प्रमुख स्तंभ है। बीएएस पृथ्वी की निम्न कक्षा (लो अर्थ ऑर्बिट) में स्थित एक पाँच मॉड्यूल वाला अंतरिक्ष स्टेशन होगा, जिसे दीर्घकालिक मानव अंतरिक्ष मिशनों और सूक्ष्म-गुरुत्वाकर्षण में उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए तैयार किया गया है। सितम्‍बर 2024 में केन्‍द्रीय मंत्रिमंडल ने इसके पहले मॉड्यूल बीएएस-01 के विकास और प्रक्षेपण को 2028 तक स्वीकृति दी, जो विस्तारित गगनयान कार्यक्रम का हिस्सा है। यह स्टेशन जीवन विज्ञान, चिकित्सा और उभरती प्रौद्योगिकियों में अनुसंधान को सक्षम बनाएगा, साथ ही पृथ्वी की कक्षा से परे भविष्य के मानव अन्वेषण मिशनों में भी सहयोग करेगा।

भारत की अंतरिक्ष में प्रगति स्पष्ट रूप से क्षमता बढ़ाने से नेतृत्व स्थापित करने की ओर एक बदलाव को दर्शाती है। देश न केवल वैज्ञानिक खोज की सीमाओं का विस्तार कर रहा है, बल्कि उन तकनीकों का भी विकास कर रहा है जो भविष्य के अंतरिक्ष अन्वेषण को आकार देंगी। महत्वाकांक्षी मिशनों, उन्नत अनुसंधान कार्यक्रमों और एक मजबूत दीर्घकालिक रूपरेखा के साथ, भारत विश्व के प्रमुख अंतरिक्ष-यात्रा करने वाले देशों में अपनी स्थिति को मजबूत कर रहा है।

निजी भागीदारी, नवाचार और तकनीकी विकास के माध्यम से क्षमता निर्माण

भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम एक वैज्ञानिक प्रयास से राष्ट्रीय विकास के एक शक्तिशाली साधन में बदल गया है। निजी क्षेत्र द्वारा भारत के अंतरिक्ष परिवर्तन को गति देने, विस्तारित स्वदेशी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी स्टैक, भारत की स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली एनएवीआईसी के विकास, उन्नत प्रक्षेपण यानों और अंतरिक्ष-आधारित सार्वजनिक सेवाओं के माध्यम से, भारत ने शासन, संपर्क, आपदा-प्रतिरोधक क्षमता, नवाचार और आर्थिक विकास में राष्ट्रीय क्षमता को मजबूत किया है। आज, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी न केवल पृथ्वी से आगे मिशनों को संभव बना रही है, बल्कि देश भर में दैनिक जीवन को भी बदल रही है।

भारत के अंतरिक्ष परिवर्तन को शक्ति देता निजी क्षेत्र

 

भारत ने अपने अंतरिक्ष क्षेत्र को सरकार के नेतृत्‍व वाले कार्यक्रम से एक जीवंत राष्ट्रीय इकोसिस्‍टम में बदल दिया है। वर्ष 2020 में निजी क्षेत्र के लिए अंतरिक्ष क्षेत्र को खोलने तथा इसके बाद लागू की गई भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 ने अंतरिक्ष मूल्य श्रृंखला के सभी क्षेत्रों में निजी भागीदारी को बढ़ावा दिया। आज स्टार्ट-अप, उद्योग और अनुसंधान संस्थान नवाचार, विनिर्माण, प्रक्षेपण सेवाओं तथा उपग्रह एप्‍लीकेशनों में लगातार पहले से अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। सरकार की विभिन्न पहलों, जैसे उदारीकृत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति, इन-स्‍पेस सीड फंड योजना, प्री-इन्क्यूबेशन उद्यमिता कार्यक्रम, 1,000 करोड़ रुपये का वेंचर कैपिटल फंड तथा 500 करोड़ रुपये का प्रौद्योगिकी स्‍वीकार करने के कोष ने इस इकोसिस्‍टम को और अधिक सशक्त बनाया है।

क्‍या आप जानते हैं?

फरवरी 2024 में सरकार ने अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) नीति को उदार बनाया, जिसके तहत चयनित कार्यों में 100 प्रतिशत तक एफडीआई की अनुमति दी गई। उपग्रह निर्माण एवं संचालन, उपग्रह डेटा उत्पादों तथा ग्राउंड/यूज़र सेगमेंट सेवाओं में 74 प्रतिशत तक एफडीआई की स्वचालित मार्ग के तहत अनुमति है। वहीं, प्रक्षेपण यानों, उनसे संबंधित प्रणालियों तथा स्पेसपोर्ट्स में 49 प्रतिशत तक एफडीआई की अनुमति है, जबकि उपग्रह एवं ग्राउंड-सेगमेंट के घटकों और उप-प्रणालियों के निर्माण में 100 प्रतिशत एफडीआई की स्वचालित मार्ग के तहत अनुमति है।

निजी क्षेत्र की भागीदारी को और बढ़ावा देने के लिए भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकरण केन्‍द्र (इन-स्‍पेस) ने वर्ष 2024 में मानदंड, दिशानिर्देश एवं प्रक्रियाएँ (एनजीपी) 2024 लागू किए। यह ढाँचा अंतरिक्ष गतिविधियों के लिए प्राधिकरण, पात्रता और अनुपालन संबंधी आवश्यकताओं को स्पष्ट रूप से निर्धारित करता है, जिससे भारत के तेजी से विकसित हो रहे अंतरिक्ष इकोसिस्‍टम में अधिक पारदर्शिता, पूर्वानुमेयता और निवेशकों का विश्वास बढ़ा है।

 

 

परिवर्तन का पैमाना अत्यंत उल्लेखनीय है। वर्ष 2014 में भारत में केवल एक पंजीकृत अंतरिक्ष स्टार्ट-अप था। फरवरी 2026 तक यह संख्या 400 से अधिक हो चुकी है। भारतीय अंतरिक्ष स्टार्ट-अप्स में 500 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का निवेश हो चुका है, जिसमें से लगभग 150 मिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश केवल वर्ष 2025 में प्राप्त हुआ। पिक्‍सल, ध्रुव स्‍पेस, स्‍काईरूट एयरोस्‍पेस, अग्निकुल कॉसमॉस और बेलाट्रिक्‍स एयरोस्‍पेस जैसी कंपनियाँ भारत के नए अंतरिक्ष युग में अग्रणी बनकर उभरी हैं।

व्यावसायीकरण  भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का विस्तार

भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का वर्तमान मूल्य लगभग 8 अरब अमेरिकी डॉलर है, जो वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में 2–3 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखती है। अगले एक दशक में इसके पाँच गुना बढ़कर 40–45 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है तथा वर्ष 2030 तक वैश्विक हिस्सेदारी 8 प्रतिशत तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया है। पिछले बारह वर्षों में सरकार महत्वपूर्ण संस्थागत सुधारों और निजी क्षेत्र की भागीदारी के माध्यम से अंतरिक्ष क्षेत्र के व्यावसायीकरण में उल्लेखनीय तेजी लाई है।

न्‍यूस्‍पेस इंडिया लिमिटेड (एनएसआईएल), जिसकी स्थापना वर्ष 2019 में हुई, तथा इंडियन नेशनल स्‍पेस प्रमोशन एंड ऑथराइजेशन सेंटर (इन-स्‍पेस), जिसकी स्थापना वर्ष 2022 में हुई, ने उद्योग की भागीदारी, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और निजी निवेश के लिए एक सुदृढ़ संस्थागत ढाँचा तैयार किया है। जहाँ एनएसआईएल इसरो की प्रौद्योगिकियों, प्रक्षेपण सेवाओं और उपग्रह सेवाओं का व्यावसायीकरण करता है, वहीं इन-स्‍पेस एकल-खिड़की व्यवस्था के माध्यम से निजी क्षेत्र की अंतरिक्ष गतिविधियों को सुगम बनाने और उन्हें अधिकृत करने का कार्य करता है।

इन सुधारों के परिणाम स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं। आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 के अनुसार, एनएसआईएल का राजस्व वित्त वर्ष 2021–22 में 321.77 करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2024–25 में 3,246.09 करोड़ रुपये हो गया। 31 जनवरी 2026 तक इन-स्‍पेस ने उद्योगों और स्टार्ट-अप्स को इसरो की 71 प्रौद्योगिकियों के हस्तांतरण को सुगम बनाया। छह भारतीय गैर-सरकारी संस्थाओं ने 18 उपग्रहों का प्रक्षेपण किया, जबकि 25 पेलोड पीओईएम (पीएसएलवी ऑरबिटल एक्‍सपेरीमेंटल मॉड्यूल) प्लेटफ़ॉर्म पर प्रक्षेपित किए गए या उनके प्रक्षेपण की योजना बनाई गई। वर्ष 2026 में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल के तहत पृथ्वी अवलोकन उपग्रह समूह को मंजूरी तथा वर्ष 2025 में एसएसएलवी प्रौद्योगिकी का एचएएल को हस्तांतरण, भारत के वाणिज्यिक अंतरिक्ष इकोसिस्‍टम को और अधिक सुदृढ़ करने वाले महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हुए।

आत्मनिर्भर अंतरिक्ष परिवहन

भारत ने वर्तमान में संचालित पीएसएलवी, जीएसएलवी और एलवीएम3 प्रक्षेपण यानों के माध्यम से निम्न पृथ्वी कक्षा (एलईओ) में 10 टन तथा भू-समकालिक स्थानांतरण कक्षा (जीटीओ) में 4.2 टन तक के उपग्रहों के प्रक्षेपण हेतु अंतरिक्ष परिवहन प्रणालियों में आत्मनिर्भरता प्राप्त कर ली है। इन प्रक्षेपण यानों ने पृथ्वी अवलोकन, संचार, नेविगेशन तथा अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए उपग्रहों को स्वतंत्र रूप से अंतरिक्ष में भेजने की क्षमता प्रदान की है। अंतरिक्ष क्षेत्र के विस्तारित दृष्टिकोण के अनुरूप प्रक्षेपण क्षमता को और बढ़ाने के लिए सरकार ने अगली पीढ़ी के प्रक्षेपण यान (एनजीएलवी) के विकास को मंजूरी दी है। यह प्रक्षेपण यान निम्न पृथ्वी कक्षा में 30 टन तक का अधिकतम पेलोड ले जाने में सक्षम होगा। अंतरिक्ष तक कम लागत वाली पहुँच सुनिश्चित करने के उद्देश्य से पुनः प्रयोज्य प्रक्षेपण यान प्रौद्योगिकियों का भी विकास किया जा रहा है। इनमें एनजीएलवी का आंशिक रूप से पुनः प्रयोज्य संस्करण भी शामिल है, जो एलईओ में 14 टन तक का पेलोड ले जाने में सक्षम होगा। इसके अतिरिक्त, पंखयुक्त ऊपरी चरण का भी विकास किया जा रहा है, जो कक्षा से पृथ्वी पर वापस लौटकर स्वतंत्र रूप से रनवे पर सुरक्षित लैंडिंग कर सकेगा।

क्‍या आप जानते हैं?

भारत अपनी अंतरिक्ष प्रक्षेपण अवसंरचना का तेजी से विस्तार कर रहा है

📌 भारत का दूसरा स्पेसपोर्ट कुलसेकरपट्टीनम स्‍पेसपोर्ट, तमिलनाडु में विकसित किया जा रहा है।

📌 स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (एसएसएलवी) कॉम्प्लेक्स की आधारशिला 28 फ़रवरी 2024 को रखी गई। यह परिसर प्रतिवर्ष 20–25 कक्षीय प्रक्षेपणों को संभालेगा तथा वित्त वर्ष 2026–27 में पहला एसएसएलवी प्रक्षेपण निर्धारित है।

📌 जनवरी 2025 में 3,984.86 करोड़ रुपये की लागत से श्रीहरिकोटा में तीसरे प्रक्षेपण पैड को मंजूरी दी गई। यह सुविधा अगली पीढ़ी के प्रक्षेपण यानों, मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशनों तथा भविष्य के चंद्र अन्वेषण अभियानों का समर्थन करेगी।

 

प्रणोदन प्रौद्योगिकियों में प्रगति

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) लगातार अंतरिक्ष परिवहन प्रणालियों की अगली पीढ़ी का निर्माण कर रहा है। इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन सिस्टम (ईपीएस) से लेकर उन्नत क्रायोजेनिक और सेमी-क्रायोजेनिक इंजनों तक, ये तकनीकी प्रगति उपग्रह मिशनों की लचीलापन क्षमता, पेलोड प्रदर्शन और लागत दक्षता को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाएंगी। इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन सिस्टम (ईपीएस) से युक्त पहला उपग्रह मिशन वर्ष 2026–27 में प्रक्षेपित किए जाने का लक्ष्य है, जो अधिक दक्ष और दीर्घकालिक अंतरिक्ष अभियानों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।

भारत ने विकास इंजन के उपयोग को प्रतिबंधित या नियंत्रित करने की क्षमता में भी महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल की हैं, जो पुन: प्रयोज्य रॉकेटों की ऊर्ध्वाधर टेक-ऑफ और लैंडिंग क्षमताओं की दिशा में एक महत्‍वपूर्ण कदम है। इसके साथ ही सीई20 क्रायोजेनिक इंजन के लिए विकसित बूटस्ट्रैप इग्निशन तकनीक ने मिशन के दौरान कई बार इंजन रीस्टार्ट करने की क्षमता प्रदान की है, जिससे परिचालन लचीलापन बढ़ा है। वहीं, स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (एसएसएलवी) के उन्नत ऊपरी चरण ने स्‍टेज मास को कम किया है और पेलोड क्षमता में लगभग 90 किलोग्राम की वृद्धि की है, जिससे भारत की किफायती छोटे उपग्रह प्रक्षेपण क्षमता और अधिक मजबूत हुई है।

पुन : प्रयोज्य प्रक्षेपण यान (आरएलवी)

इसरो का आरएलवी-टीडी कार्यक्रम कम लागत और पुन: प्रयोज्य अंतरिक्ष परिवहन प्रणालियों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह एक उन्‍नत त‍कनीक वाले भविष्य के विमान की तरह तैयार किया गया पंख वाला वाहन है, जो प्रक्षेपण यानों और विमानों—दोनों की जटिल तकनीकों का संयोजन है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य पूर्णतः पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण प्रणालियों के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण तकनीकों का विकास करना है, जिससे अंतरिक्ष तक पहुँचने की लागत को काफी हद तक कम किया जा सके। आरएलवी-टीडी एक फ्लाइंग टेस्ट बेड के रूप में कार्य करता है, जिसमें हाइपरसोनिक उड़ान, स्वतंत्र लैंडिंग और एकीकृत उड़ान प्रबंधन  जैसी उन्नत तकनीकों का परीक्षण किया जाता है।

इस कार्यक्रम के तहत भारत ने पहले ही महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल की हैं। इसरो ने 23 मई 2016 को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केन्‍द्र एसएचएआर से आरएलवी-टीडी का सफल उड़ान परीक्षण किया, जिसमें स्वतंत्र नेविगेशन, मार्गदर्शन एवं नियंत्रण प्रणाली, पुन: प्रयोज्य तापीय सुरक्षा प्रणाली और पुन: प्रवेश मिशन प्रबंधन तकनीकों का सत्यापन किया गया। इसके बाद इस कार्यक्रम के अंतर्गत अब तक तीन सफल स्वायत्त रनवे लैंडिंग प्रयोग भी पूरे किए जा चुके हैं।

स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑन-बोर्ड सिस्टम

इसरो ने सेमीकंडक्टर लेबोरेटरी (एससीएल), चंडीगढ़ के साथ मिलकर उच्च विश्वसनीयता वाले अंतरिक्ष मिशनों के लिए कल्‍पना32 के साथ-साथ भारत का पहला पूर्णतः स्वदेशी 32-बिट स्पेस माइक्रोप्रोसेसर विक्रम3201, विकसित किया है। इससे विदेशी घटकों पर निर्भरता कम होती है और मिशनों की सुरक्षा एवं विश्वसनीयता में वृद्धि होती है।

भारत की बढ़ती अंतरिक्ष क्षमता पिछले 12 वर्षों में हुए व्यापक राष्ट्रीय परिवर्तन की कहानी को दर्शाती है। तकनीक, अवसंरचना और नवाचार में निरंतर निवेश ने देश की क्षमताओं का विस्तार किया है और बाहरी प्रणालियों पर निर्भरता को कम किया है। मेक इन इंडिया की भावना से प्रेरित ये प्रयास विज्ञान, उद्योग और विकास के नए अवसर उत्पन्न कर रहे हैं। ये भारत को विकसित भारत की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ा रहे हैं और एक प्रमुख अंतरिक्ष-यात्रा करने वाले राष्ट्र के रूप में इसकी स्थिति को और मजबूत कर रहे हैं।

वैश्विक मंच पर भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र की विश्वसनीयता

भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआत से ही अंतरराष्ट्रीय सहयोग, इसकी आधारशिला रहा है। पिछले 12 वर्षों में भारत ने वैश्विक अंतरिक्ष साझेदारियों का उल्लेखनीय विस्तार किया है, जिससे वैज्ञानिक सहयोग, प्रौद्योगिकी आदान-प्रदान और संयुक्त मिशन विकास को मजबूती मिली है। इसरो ने 1990 के दशक से 2014 तक कुल 35 विदेशी उपग्रहों का प्रक्षेपण किया था। वहीं, वर्ष 2014 के बाद से मार्च 2026 तक यह संख्या बढ़कर 399 विदेशी उपग्रह प्रक्षेपणों तक पहुँच गई। इसके अतिरिक्त, वर्ष 2026 तक भारत ने 61 देशों और 5 बहुपक्षीय संगठनों के साथ 300 से अधिक अंतरिक्ष सहयोग समझौते किए हैं। ये साझेदारियाँ उपग्रह मिशनों, डेटा साझाकरण, ग्राउंड स्टेशन सहयोग, वैज्ञानिक अनुसंधान और क्षमता निर्माण जैसे क्षेत्रों को शामिल करती हैं। पिछले दशक में विकसित प्रमुख अंतरराष्ट्रीय सहयोग और रणनीतिक साझेदारियाँ नीचे दर्शाई गई हैं।

 

क्‍या आप जानते हैं?

भारत अपनी पड़ोसी प्रथम नीति के अंतर्गत बिम्‍सटेक अंतरिक्ष कार्यक्रम की अगुवाई कर रहा है। यह पहल अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, आपदा प्रबंधन और क्षमता निर्माण के माध्यम से क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करती है। नॉर्थ-ईस्‍टर्न स्‍पेस एप्‍लीकेशन्‍स सेंटर (एनईएसएसी) बिम्‍सटेक देशों के लिए अंतरिक्ष एप्‍लीकेशनों और उपग्रह प्रौद्योगिकी पर विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित करता है। भारत ने जलवायु और आपदा प्रबंधन के लिए क्षेत्रीय स्तर पर नैनो-उपग्रहों, स्थानीय ग्राउंड स्टेशनों की स्थापना तथा साझा पृथ्वी अवलोकन का भी प्रस्ताव दिया है। इसके अतिरिक्त, बिम्‍सटेक मौसम एवं जलवायु केन्‍द्र क्षेत्रीय मौसम पूर्वानुमान और आपदा तैयारी में योगदान देता है। वहीं, अंतरिक्ष सुरक्षा सहयोग पर विशेषज्ञ समूह क्षेत्रीय लचीलापन और रणनीतिक सहयोग को और मजबूत करता है।

 

भारत-रूस साझेदारी  भारत की मानव अंतरिक्ष उड़ान महत्वाकांक्षाओं को समर्थन

 

भारत का मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम रूस के साथ लंबे समय से चली आ रही साझेदारी से लाभान्वित हुआ है। अंतरिक्ष सहयोग के दशकों पुराने अनुभव पर आधारित रहते हुए, गगनयान मिशन को समर्थन प्रदान करने के लिए इसरो और रॉसकोसमॉस ने वर्ष 2018 में एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए। इसके अंतर्गत रूस ने अंतरिक्ष यात्री प्रशिक्षण, तकनीकी विशेषज्ञता तथा जीवन-रक्षक प्रणाली, चालक दल की सुरक्षा और मानव अंतरिक्ष उड़ान से संबंधित तकनीकों जैसे महत्‍वपूर्ण क्षेत्रों में सहायता प्रदान की। इस साझेदारी ने भारत की पहली स्वदेशी मानवयुक्त अंतरिक्ष उड़ान के लिए उसकी तैयारी को मजबूत किया और यह भारत की बढ़ती अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाओं पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के विश्वास को भी दर्शाता है।

 

क्‍या आप जानते हैं? भारत की रूस के साथ अंतरिक्ष साझेदारी वर्ष 1975 से प्रारंभ होती है, जब सोवियत संघ ने भारत के पहले उपग्रह आर्यभट्ट का प्रक्षेपण किया था। इसके बाद वर्ष 1984 में इस सहयोग ने एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की, जब विंग कमांडर राकेश शर्मा सोयुज टी-11 अंतरिक्ष यान से अंतरिक्ष में गए—यह भारत की पहली मानव अंतरिक्ष उड़ान का मील का पत्थर था। आज यह साझेदारी ग्‍लोनास और नेवआईसी के जरिये गगनयान मिशन, उपग्रह नेविगेशन सहयोग तथा भविष्य की अंतरिक्ष अन्वेषण पहलों तक बढ़ चुकी है। यह निरंतर सहयोग भारत–रूस अंतरिक्ष साझेदारी की दीर्घकालिक विश्वसनीयता और रणनीतिक गहराई को दर्शाता है।

 

इसरो और नासा

अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत की बढ़ती प्रतिष्ठा प्रमुख वैश्विक अंतरिक्ष एजेंसियों के साथ उसके सहयोग में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण नासा-इसरो सिंथेटिक अपर्चर रडार (एनआईएसएआर) मिशन है, जिसे इसरो और नासा ने संयुक्त रूप से विकसित किया है और जिसे 30 जुलाई 2025 को श्रीहरिकोटा से जीएसएलवी-एफ16 रॉकेट द्वारा प्रक्षेपित किया गया। एनआईएसएआर मिशन भूमि, हिमनदों, वनों और महासागरों में होने वाले परिवर्तनों की निगरानी करेगा, जिससे वैज्ञानिकों को जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाओं और पर्यावरणीय चुनौतियों को बेहतर ढंग से समझने में सहायता मिलेगी। यह मिशन दुनिया की दो अग्रणी अंतरिक्ष एजेंसियों की विशेषज्ञता को एक साथ लाता है और जटिल अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं को सफलतापूर्वक संचालित करने की भारत की क्षमता को दर्शाता है।

 

इसरो और फ्रांस की अंतरिक्ष एजेंसी सीएनईएस

 

भारत की विस्तृत होती वैश्विक साझेदारियाँ तृष्‍णा (थर्मल इन्‍फ्रारेड इमेजिंग सेटलाइट फॉर हाई-रेजोल्‍यूशन नेचुरल रिसॉर्स असेसमेंट) मिशन में भी परिलक्षित होती हैं, जिसे इसरो और फ्रांस की अंतरिक्ष एजेंसी सीएनईएस संयुक्त रूप से विकसित कर रहे हैं। यह मिशन वर्ष 2026 में प्रक्षेपित किए जाने की योजना है, तृष्‍णा पृथ्वी के स्थलीय एवं तटीय क्षेत्रों की उच्च-रिज़ॉल्यूशन थर्मल इमेजिंग प्रदान करेगा, जिसकी रीविजिट फ्रीक्‍वेन्‍सी वर्तमान मिशनों की तुलना में अधिक उन्नत होगी। यह उपग्रह फसल जल तनाव, सिंचाई आवश्यकताओं, जल संसाधनों, शहरी इकोसिस्‍टम, हिमनदों और जलवायु से जुड़े परिवर्तनों की निगरानी में सहायता करेगा। सीएनईएस के थर्मल इन्फ्रारेड उपकरण और इसरो के ऑप्टिकल सेंसर का मेल, यह मिशन उन्नत पृथ्वी अवलोकन और जलवायु विज्ञान में भारत के एक भरोसेमंद वैश्विक भागीदार के रूप में भारत की बढ़ती विश्वसनीयता को दर्शाता है, साथ ही यह दुनिया भर में स्‍थायी कृषि और पर्यावरण प्रबंधन में भी महत्वपूर्ण योगदान देगा।

 

इसरो और जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी (जेएएक्सए)

भारत की गहरे अंतरिक्ष अन्वेषण में बढ़ती विश्वसनीयता चन्‍द्रयान-5/ल्‍यूपेक्‍स (लूनर पोलर एक्‍सप्‍लोरेशन) मिशन में भी परिलक्षित होती है, जो इसरो और जापान एयरोस्‍पेस एक्‍सप्‍लोरेशन एजेंसी (जेएएक्‍सए) के बीच एक महत्वपूर्ण सहयोगात्मक परियोजना है। यह मिशन वर्ष 2027–28 में जापान के एच3 रॉकेट से प्रक्षेपित किए जाने की योजना है। चंद्रमा के ध्रुवीय क्षेत्र का विस्तृत अन्वेषण करने के लिए इसमें भारत द्वारा विकसित एक लैंडर और जापान द्वारा विकसित एक रोवर शामिल होगा। चन्‍द्रयान-3 की सफलता और चन्‍द्रयान-4 के प्रस्तावित सैंपल रिटर्न की योजना पर आगे बढ़ते हुए, ल्‍यूपैक्‍स मिशन का उद्देश्य चन्‍द्रमा की सतह पर पानी और बर्फ की खोज करना, सतह के नीचे ड्रिलिंग करना और आसपास उन्नत वैज्ञानिक अध्ययन करना है। इस मिशन में नासा और यूरोपियन अंतरिक्ष एजेंसी (ईएसए) के उपकरण भी शामिल हैं, जो भारत की जटिल अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष परियोजनाओं का नेतृत्व करने की क्षमता और वैश्विक चंद्र अन्वेषण के अगले चरण में उसके महत्वपूर्ण योगदान को दर्शाता है।
 

यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ईएसए) के साथ साझेदारी

 

ईएसए और इसरो ने 7 मई 2025 को भविष्य के मानव अंतरिक्ष मिशनों पर सहयोग के लिए एक औपचारिक संयुक्त वक्तव्य पर हस्ताक्षर किए। यह साझेदारी मुख्य रूप से लो अर्थ ऑर्बिट गतिविधियों और भविष्य में चन्‍द्रमा अन्वेषण पर केन्‍द्रित है। दोनों एजेंसियाँ ऐसी तकनीकों पर कार्य करेंगी, जो विभिन्न देशों के अंतरिक्ष यानों, साथ ही अंतरिक्ष यात्री प्रशिक्षण और अंतरिक्ष अनुसंधान में भी सहयोग को बढ़ावा देंगी। यह समझौता यूरोपीय अंतरिक्ष यात्रियों के भारत के प्रस्तावित भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (बीएएस) से संबंधित मिशनों में भाग लेने की संभावनाएँ भी खोलता है, साथ ही चंद्रमा पर संयुक्त वैज्ञानिक मिशनों का मार्ग भी प्रशस्त करता है। एक्‍सीओम एएक्‍स-4 मिशन में सहयोग के अनुभव पर आगे बढ़ते हुए, ईएसए और इसरो मिलकर भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों को अधिक जुड़ा हुआ, कुशल और सहयोगात्मक बनाने की दिशा में कार्य कर रहे हैं। यह साझेदारी भारत की अंतरिक्ष क्षमताओं पर बढ़ते अंतरराष्ट्रीय विश्वास और मानव अंतरिक्ष अन्वेषण के भविष्य को आकार देने में उसकी बढ़ती भूमिका को दर्शाती है।

 

भारत-जर्मनी अंतरिक्ष सहयोग

भारत ने अपने प्रक्षेपण यानों के माध्यम से अब तक 11 जर्मन उपग्रहों का सफल प्रक्षेपण किया है, जो भारत की अंतरिक्ष क्षमताओं पर अंतरराष्ट्रीय विश्वास को दर्शाता है। भारत और जर्मनी ने 2 जून 2026 को एक उच्च-स्तरीय बैठक में उपग्रह संचार, ऑप्टिकल कम्युनिकेशन, मानव अंतरिक्ष उड़ान, माइक्रोग्रैविटी अनुसंधान, पृथ्वी अवलोकन, ड्रोन तकनीक तथा भविष्य के अंतरिक्ष अन्वेषण मिशनों जैसे क्षेत्रों में सहयोग के नए अवसरों की पहचान की। ये बातचीत इसरो और जर्मन एयरोस्पेस सेंटर (डीएलआर) के बीच लंबे समय से चली आ रही साझेदारी पर आधारित थी और इसमें उभरते हुए अंतरिक्ष क्षेत्रों में संयुक्त अनुसंधान, नवाचार और उभरते अंतरिक्ष क्षेत्रों में संयुक्त अनुसंधान पर जोर दिया गया।

इटली-भारत संयुक्‍त रणनीतिक कार्य योजना 2025-2029

भारत और इटली ने अपने अंतरिक्ष सहयोग को भारत–इटली संयुक्त रणनीतिक कार्य योजना के तहत और अधिक मजबूत किया, जिसे 18 नवम्‍बर 2024 को रियो डी जनेरियो में आयोजित जी20 शिखर सम्मेलन के दौरान घोषित किया गया। दोनों देश पृथ्वी अवलोकन, हेलियोफिज़िक्स और अंतरिक्ष अन्वेषण के क्षेत्रों में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और इटली की अंतरिक्ष एजेंसी (एएसआई) के बीच सहयोग को विस्तार देने पर सहमत हो गए। इस साझेदारी में चन्‍द्रमा विज्ञान को प्रमुखता दी गई। दोनों देशों ने अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण और दीर्घकालिक उपयोग के लिए अनुसंधान एवं विकास को आगे बढ़ाने तथा उद्योगों, एमएसएमई और स्टार्टअप्स की भागीदारी के माध्यम से वाणिज्यिक सहयोग को बढ़ावा देने पर भी सहमति व्यक्त की।

 

इसरो और सउदी अंतरिक्ष एजेंसी

 

भारत और सऊदी अरब ने 23 अप्रैल 2025 को इसरो और सउदी अंतरिक्ष एजेंसी के बीच एक एमओयू के माध्यम से अपने अंतरिक्ष सहयोग को और मजबूत किया। यह समझौता उपग्रह विकास, अंतरिक्ष विज्ञान, अंतरिक्ष अन्वेषण, अनुसंधान, नवाचार और क्षमता निर्माण जैसे क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा देता है। साथ ही यह अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में उद्यमिता और अकादमिक सहभागिता को भी प्रोत्साहित करता है जो दोनों देशों की प्रतिबद्धता को दर्शाती है कि बाह्य अंतरिक्ष का उपयोग केवल विकास और शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए किया जाए।

 

इसरो और मॉरीशस रिसर्च एंड इनोवेशन काउंसिल

भारत की मॉरीशस के साथ दीर्घकालिक अंतरिक्ष साझेदारी ने 1 नवम्‍बर 2023 को एक नए चरण में प्रवेश किया। इसरो और मॉरीशस रिसर्च एंड इनोवेशन काउंसिल (एमआरआईसी) ने मिलकर एक छोटे उपग्रह के संयुक्त विकास के लिए एमओयू पर हस्ताक्षर किए, जिसे 5 जनवरी 2024 को केन्‍द्रीय मंत्रिमंडल ने भी संज्ञान में लिया। यह परियोजना उपग्रह विकास क्षमताओं को मजबूत करने, मॉरीशस के ग्राउंड स्टेशन के उपयोग को बढ़ावा देने और 1986 से चले आ रहे दोनों देशों के सहयोग को और मजबूत करती है। इस उपग्रह को लगभग 15 महीने में तैयार करने की योजना है, जिसकी अनुमानित लागत 20 करोड़ रुपये है, जिसे भारत सरकार द्वारा वित्त पोषित किया जा रहा है।

भूटान के साथ अंतरिक्ष क्षेत्र में क्षेत्रीय साझेदारी

भारत के अंतरिक्ष सहयोग ने क्षेत्रीय साझेदारियों को सुदृढ़ किया है, विशेषकर भूटान के साथ। इस दिशा में 19 नवम्‍बर 2020 को भारत और भूटान ने बाह्य अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग में सहयोग पर एक एमओयू पर हस्ताक्षर किए, जिसे 30 दिसम्‍बर 2020 को केन्‍द्रीय मंत्रिमंडल ने मंजूरी दे दी। यह समझौता पृथ्वी अवलोकन, उपग्रह संचार, उपग्रह नेविगेशन, अंतरिक्ष विज्ञान, ग्रह अन्वेषण और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के विकासात्मक एप्‍लीकेशनों जैसे व्यापक क्षेत्रों को शामिल करता है।

सहयोगी परियोजनाओं, शासन व्यवस्था, संसाधन प्रबंधन, संचार प्रणाली और अंतरिक्ष आधारित समाधानों के माध्यम से वैज्ञानिक अनुसंधान को लागू करने के लिए एक संयुक्त कार्य समूह का गठन किया गया।

 

नागरिकों के लिए स्थान - रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जुड़े एप्‍लीकेशन्‍स

 

पिछले दशक में, भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय बुनियादी ढाँचे के रूप में विकसित हुआ है, जो शासन व्यवस्था, विकास, पर्यावरण प्रबंधन और आपदाओं से निपटने की क्षमता में सहयोग देता है। उपग्रह-आधारित डेटा, जियोस्पेशियल टेक्नोलॉजी और डिजिटल प्लेटफॉर्म डेटा-आधारित फ़ैसले लेने में मदद कर रहे हैं, पारदर्शिता बढ़ा रहे हैं और अलग-अलग क्षेत्र में सरकारी कार्यक्रमों की प्रभावशीलता को बेहतर बना रहे हैं।

 

एनएवीआईसी - भारत की स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली

एनएवीआईसी भारत की स्वदेशी उपग्रह नेविगेशन प्रणाली है। यह देश में तथा इसकी सीमाओं से लगभग 1,500 किलोमीटर तक सटीक स्थिति निर्धारण, नेविगेशन और समय-निर्धारण सेवाएँ प्रदान करती है।

यह प्रणाली विदेशी नेविगेशन प्रणालियों पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से विकसित की गई है, एनएवीआईसी भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता तथा रणनीतिक क्षमता को मजबूत करती है। यह प्रणाली एक उपग्रह समूह के माध्यम से निरंतर क्षेत्रीय कवरेज प्रदान करती है। इस नेटवर्क को और मजबूत बनाने के लिए विकसित किये गए दूसरी पीढ़ी के पहले उपग्रह एनवीएस-01 को मई 2023 में प्रक्षेपित किया गया, जबकि एनवीएस-02 को जनवरी 2025 में छोड़ा गया। दूसरी पीढ़ी के कुल पाँच उपग्रहों (एनवीएस-01 से एनवीएस-05) के विश्वसनीयता बढ़ाने और निर्बाध सेवाएँ सुनिश्चित करने की योजना है।

 

एनएवीआईसी भारत के डिजिटल और भौतिक बुनियादी ढांचे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। यह पावर ग्रिड सिंक्रोनाइजेशन, रियल-टाइम ट्रेन ट्रैकिंग, वाहन निगरानी, आधार-आधारित डिवाइस जियो-टैगिंग और सार्वजनिक सुरक्षा अलर्ट प्रणाली जैसी सेवाओं को सहयोग प्रदान करता है। इसकी उपयोगिता लॉजिस्टिक्स, जहाजों की निगरानी, जियो-फेंसिंग और लोकेशन-आधारित सेवाओं तक तेजी से बढ़ रही है। इसके अलावा, इसरो ने एनएवीआईसी को मोबाइल चिपसेट्स से जोड़ने के लिए क्‍वालकौम सहित उद्योग के साथ साझेदारी की है ताकि यह आम उपयोगकर्ताओं तक पहुंच सके।

 

 

क्‍या आप जानते हैं:

वर्ष 2025 में एनएवीआईसी रेफरेंस स्टेशन स्थापित करने के लिए भारत ने दक्षिण अफ्रीका के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। यह पहल भारत की स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली के प्रदर्शन और उसकी पहुँच को राष्ट्रीय सीमाओं के पार और मजबूत करेगी। यह साझेदारी नेविगेशन सहयोग बढ़ाएगी और यह भारत की अंतरिक्ष आधारित पोजिशनिंग और टाइमिंग क्षमताओं में बढ़ते अंतरराष्ट्रीय विश्वास को दर्शाता है।

 

 

डेटा – आधारित सुशासन

 

भारत में विभिन्न मंत्रालय—जैसे कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, जल शक्ति मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय और राज्य सरकारें—तेजी से जियोस्पेशियल सूचना, थीमैटिक एप्लिकेशन्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का उपयोग शासन और सार्वजनिक सेवा वितरण में कर रही हैं। उपग्रह-आधारित डेटा के उपयोग से योजना अधिक सटीक हुई है और वास्तविक समय में निगरानी, संसाधन प्रबंधन और विकास कार्यक्रमों के कार्यान्वयन में दक्षता बढ़ी है।

खाद्य और जल सुरक्षा

अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी उपग्रह-आधारित निगरानी और पूर्वानुमान के माध्यम से खाद्य और जल सुरक्षा को मजबूत बनाती है। उपग्रह डेटा के उपयोग से फसल क्षेत्र आकलन, उत्पादन पूर्वानुमान, सूखा आकलन और फसल उपज अनुमान जैसी प्रक्रियाएँ अधिक सटीक और विश्वसनीय हो गई हैं। ये सभी कृषि योजना और बीमा योजनाओं में सहायक हो गए हैं। जल संसाधन प्रबंधन के क्षेत्र में, नेशनल हाइड्रोलॉजी प्रोजेक्‍ट के अंतर्गत हाइड्रो-इंफॉर्मेटिक्स सेवाएँ तथा भारत जल संसाधन सूचना प्रणाली (इंडिया-डब्‍ल्‍यूआरआईएस) जल संसाधनों की योजना और प्रबंधन को अधिक वैज्ञानिक और डेटा-आधारित बनाती हैं।

आपदा प्रबंधन और पूर्व चेतावनी

भारत के अंतरिक्ष बुनियादी ढांचे ने आपदा तैयारी और आपातकालीन प्रतिक्रिया को काफी मजबूत बनाया है। उपग्रहों के माध्यम से चक्रवात, बाढ़, भूस्खलन, जंगलों में लगने वाली आग और अन्य प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी संभव हो पाती है। इस प्रणाली में नेशनल डेटाबेस फॉर इमरजेंसी मैनेजमेंट (एनडीईएम 5.0) वास्तविक समय जियोस्पेशियल जानकारी और निर्णय-समर्थन उपकरण प्रदान करता है।

इसके साथ ही उपग्रह की सहायता से खोज और बचाव (एसएएसएआर) कार्यक्रम संकट में फंसे लोगों के लिए आपातकालीन अलर्ट और खोज एवं बचाव सेवाओं को सक्षम बनाता है।

 

शासन और ग्रामीण विकास

जियोस्पेशियल तकनीकें भारत में प्रमुख सरकारी योजनाओं के पारदर्शी क्रियान्वयन में सहयोग कर रही हैं। इनमें मनरेगा, पीएमजीएसवाई, पीएमकेएसवाई, अमृत, हरित आवरण की निगरानी और नेशनल एड्रेसिंग सिस्‍टम शामिल हैं। उपग्रह-आधारित प्लेटफॉर्म राष्ट्रीय स्तर से लेकर ग्राम स्तर तक साक्ष्‍य-आधारित योजना और निगरानी में सहयोग करते हैं।

 

तटीय समुदायों को सहयोग

मछली पकड़ने के संभावित क्षेत्र (पीएफजैड) के संबंध में सलाहें मछुआरों को अधिक उत्पादक मत्स्य क्षेत्र पहचानने में सहायता करती हैं। इन सूचनाओं के माध्यम से खोज समय और ईंधन खपत दोनों में कमी आती है। साथ ही, स्वदेशी संकट चेतावनी ट्रांसमीटर (डीएटी) समुद्र में सुरक्षा को मजबूत करते हैं, क्योंकि ये आपात स्थिति में मछली पकड़ने वाले जहाजों से त्वरित अलर्ट भेजने की सुविधा प्रदान करते हैं।

स्‍वास्‍थ्‍य और शिक्षा में उपग्रह आधारित समाधान

इसरो की टेलीमेडिसिन सेवाएँ सुदूरवर्ती और अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच बढ़ाती हैं। जम्मू और कश्मीर, लेह, लद्दाख, सियाचिन और अन्य रणनीतिक क्षेत्रों में टेलीमेडिसिन नोड्स काम कर रहे हैं। वर्तमान में लगभग 179 टेलीमेडिसिन नोड्स कार्यरत हैं, जिनमें से करीब 80 अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों में स्थित हैं। ये सेवाएँ विशेषज्ञ डॉक्टरों से परामर्श को संभव बनाकर स्थानीय आबादी को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराती हैं।

इसके अलावा उपग्रह संचार ने पूरे देश में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की पहुँच को भी व्यापक बनाया है। पीएम ई-विद्या कार्यक्रम के अंतर्गत जीसेट-15 और जीसेट-9 उपग्रहों के माध्यम से लगभग 370 शैक्षिक टीवी चैनल प्रसारित किए जा रहे हैं। यह सेवाएं डिजिटल लर्निंग, शिक्षक प्रशिक्षण और सुदूरवर्ती क्षेत्रों तक शैक्षिक सामग्री पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

 

क्‍या आप जानते हैं

 

साउथ एशिया सेटलाइट (जीसेट-9) 2,230 किलोग्राम का भू-स्थिर संचार उपग्रह है, जो अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, मालदीव, नेपाल और श्रीलंका को कवरेज प्रदान करता है। इसे सार्क क्षेत्र के पड़ोसियों को एक उपहार के रूप में 5 मई 2017 को श्रीहरिकोटा से जीएसएलवी-एफ09 रॉकेट से छोड़ा गया था।

इसरो द्वारा निर्मित और पूरी तरह भारत द्वारा वित्त पोषित इस उपग्रह की कुल लागत लगभग 450 करोड़ रुपये थी। उपग्रह में 12 केयू-बैंड ट्रांसपोंडर लगे हैं, जिनमें प्रत्येक भागीदार देश को एक-एक ट्रांसपोंडर उपयोग के लिए दिया गया है। यह उपग्रह क्षेत्र में डीटीएच प्रसारण, टेलीमेडिसिन, टेली-शिक्षा, बैंकिंग कनेक्टिविटी, मौसम पूर्वानुमान और आपदा प्रबंधन जैसी सेवाओं को सहयोग देता है। इसकी डिज़ाइन मिशन लाइफ लगभग 12 वर्ष है। प्रारंभ में इसे “सार्क सेटलाइट” नाम दिया गया था, लेकिन पाकिस्तान के इस परियोजना से अलग होने के बाद इसका नाम बदलकर “साउथ एशिया सेटलाइट” कर दिया गया।

 

 

जियोपोर्टल और नागरिक-केन्‍द्रित डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म 

 

इसरो विभिन्न विशेषीकृत जियोपोर्टल्स संचालित करता है, जो उपग्रह-आधारित जानकारी को शासन और सार्वजनिक उपयोग के लिए उपलब्ध कराते हैं। भूनिधि, मोसडैक, वेदास और भुवन डिजिपिन इंटीग्रेशन के जरिये पृथ्वी अवलोकन, मौसम सेवाएँ, बुनियादी ढांचे की निगरानी, बाढ़ प्रबंधन और डिजिटल एड्रेसिंग जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण सहायता प्रदान करते हैं।

पिछले दशक में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी भारत में दैनिक जीवन का एक अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। अंतरिक्ष-आधारित एप्‍लीकेशन अब शासन व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, आपदा प्रबंधन और आजीविका के क्षेत्रों में सहयोग प्रदान कर रहे हैं। ये सभी प्रगति विज्ञान और प्रौद्योगिकी के माध्यम से समावेशी विकास के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाती हैं। जैसे-जैसे भारत विकसित भारत की दिशा में आगे बढ़ रहा है, अंतरिक्ष कार्यक्रम सार्वजनिक सेवा वितरण को मजबूत करने और नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाने में लगातार महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

 

एक ज़िम्मेदार अंतरिक्ष शक्ति बनने की दिशा में

 

पिछले बारह वर्षों में भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम ने यह स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया है कि तकनीकी प्रगति सीधे राष्ट्रीय विकास को कैसे समर्थन दे सकती है। अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी अब शासन व्यवस्था को सशक्त बना रही है, आर्थिक वृद्धि को गति दे रही है और नागरिकों के दैनिक जीवन में सुधार ला रही है। भारत की इस प्रगति के पीछे स्वदेशी नवाचार, वैज्ञानिक उत्कृष्टता और जन-कल्याण रहे हैं। साथ ही, भारत ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग, वाणिज्यिक प्रक्षेपणों और ज्ञान-साझाकरण के माध्यम से स्वयं को एक भरोसेमंद वैश्विक अंतरिक्ष साझेदार के रूप में स्थापित किया है। देश निरंतर बाह्य अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण और जिम्मेदार उपयोग को बढ़ावा दे रहा है। जैसे-जैसे भारत स्‍पेस विजन 2047 की ओर अग्रसर हो रहा है, उसका ध्यान वैज्ञानिक सीमाओं का विस्तार करने के साथ-साथ समाज को फायदा पहुंचाने पर केन्‍द्रित है। आगे की यात्रा का उद्देश्‍य अंतरिक्ष-आधारित नवाचार और विकास के जरिये एक अधिक मजबूत, आत्मनिर्भर और वैश्विक स्तर पर सम्मानित भारत का निर्माण करना है।

संदर्भ

 

अंतरिक्ष का विकास

 

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन

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